शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

बोधगया : बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति की सुन्दर भूमि

मेरा जन्म बिहार में हुआ , परंतु पढाई-लिखाई आदि मध्य प्रदेश में होने के कारण अपने गृह राज्य में बिलकुल भी नही घूम सका।  खैर जब मेरी शादी तय हुई , और मुझे पता चला कि मेरे ससुराल वाले गया में रहते है , तो मेरी  ख़ुशी का ठिकाना न रहा।  क्योंकि गया न केवल बिहार का बल्कि भारत का भी एक प्रमुख पर्यटन केंद्र है , साथ ही बोधगया तो अंतरराष्ट्रीय तीर्थ है।  खैर मेरे गया घूमने का दिन आ ही गया , जब मेरी  धर्मपत्नी जी अपने मायके गयी थी , तो जनवरी  2015 के आखिरी सप्ताह में मुझे गया जाने का सुअवसर मिल गया।  ये मेरी पहली ससुराल यात्रा भी थी।  (शादी गया से नही, बल्कि बक्सर जिले में गांव से हुई थी ) मैं झाँसी से चम्बल एक्सप्रेस से गया के लिए बैठा।  अपनी इस यात्रा में ससुराल जाने से ज्यादा रोमांच गया जाने का था।  क्योंकि गया जहाँ पिंडदान की वजह से हिंदुओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है , वही  गया से लगा हुआ बोधगया बौद्ध धर्म का पूरे विश्व में सबसे बड़ा तीर्थ है।  चूँकि मैं इतिहास के साथ ही मानव विज्ञान का भी छात्र रहा हूँ , इसलिए ये दोनों स्थान मेरे लिए और अधिक महत्वपूर्ण हो गए।  रात्रि दो बजे के लगभग चम्बल एक्सप्रेस गया जंक्शन पहुंची। नक्सली क्षेत्र  कारण रात में मुझे रेलवे स्टेशन पर ही रुकने की हिदायत मिली थी।  सुबह चार बजे के लगभग मेरे बड़े साले ध्रुव मुझे लेनेआये।  मुझे रस्ते में बिहार की अन्य जगहों की तुलना में यहां अधिक पुलिस कर्मी और CRPF के जवान चप्पे चप्पे पर तैनात मिले। हालाँकि इसका एक कारण तत्कालीन तेजतर्रार एस एसपी मनु महराज भी बताये गए।  खैर भोरे-भोरे ससुराल पहुंचे , परंपरा अनुसार खूब आदर सत्कार हुआ।  और दिन में साले -सालियों और पत्नी जी के साथ निकल पड़े बोधगया की सैर पर ... 
बोधगया की सैर से पहले हम थोड़ा सा इसका इतिहास जान लेते है। लगभग 528 ई॰ पू. के वैशाख (अप्रैल-मई) महीने में कपिलवस्‍तु के राजकुमार सिद्धार्थ  ने सत्‍य की खोज में घर त्‍याग दिया। सिद्धार्थ  ज्ञान की खोज में निरंजना (वर्तमान में फल्गु ) नदी के तट पर बसे एक छोटे से गांव उरुवेला आ गए। वह इसी गांव में एक पीपल के पेड़ के नीचे ध्‍यान साधना करने लगे। एक दिन वह ध्‍यान में लीन थे कि गांव की ही एक लड़की सुजाता उनके लिए एक कटोरा खीर तथा शहद लेकर आई। इस भोजन को करने के बाद गौतम पुन: ध्‍यान में लीन हो गए। इसके कुछ दिनों बाद ही उनके अज्ञान का बादल छट गया और उन्‍हें ज्ञान की प्राप्‍ित हुई। अब वह राजकुमार सिद्धार्थ या तपस्‍वी गौतम नहीं थे बल्कि बुद्ध थे। बुद्ध जिसे सारी दुनिया को ज्ञान प्रदान करना था। ज्ञान प्राप्‍ित के बाद वे अगले सात सप्‍ताह तक उरुवेला के नजदीक ही रहे और चिंतन मनन किया। इसके बाद बुद्ध वाराणसी के निकट ऋषिपत्तन (वर्तमान सारनाथ)  गए जहां उन्‍होंने अपने ज्ञान प्राप्‍ित की घोषणा की। बुद्ध कुछ महीने बाद उरुवेला लौट गए। यहां उनके पांच मित्र अपने अनुयायियों के साथ उनसे मिलने आए और उनसे दीक्षित होने की प्रार्थना की। इन लोगों को दीक्षित करने के बाद बुद्ध राजगीर चले गए। इसके बाद बुद्ध के उरुवेला वापस लौटने का कोई प्रमाण नहीं मिलता है। दूसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व के बाद उरुवेला का नाम इतिहास के पन्‍नों में खो जाता है। इसके बाद यह गांव सम्‍बोधि, वैजरसना या महाबोधि नामों से जाना जाने लगा। बोधगया शब्‍द का उल्‍लेख 18 वीं शताब्‍दी से मिलने लगता है। इसके बाद उन्हों ने वहां ७ हफ्ते अलग अलग जगहों पर ध्यान करते हुए बिताया और फिर सारनाथ जा कर धर्म का प्रचार शुरू किया। बुद्ध के अनुयायिओं ने बाद में उस जगह पर जाना शुरू किया जहां बुद्ध ने वैशाख महीने में पुर्णिमा के दिन ज्ञान की प्रप्ति की थी। धीरे धीरे ये जगह बोधगया  के नाम से जाना गया और ये दिन बुद्ध पुर्णिमा के नाम से जाना गया। जहाँ सिद्धार्थ को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई यानि ज्ञान का बोध हुआ  और चूँकि गया के नजदीक है , इसलिए बोधगया कहलाया।  
बोधगया में प्रवेश करने पर ही एक सुन्दर द्वार मिलता है।  यही से भगवा और लाल रंग के कपडे पहने बौद्ध भिक्षु या लामा नजर आने लगते है।  बोधगया आने वाला लगभग हर यात्री अपनी यात्रा महाबोधि मंदिर (विहार ) से ही अपनी यात्रा शुरू करता है।  तो हम भी चल पड़े महाबोधि मन्दिर के दर्शन करने।  यहां अंदर मोबाइल ले जाना मना है , जबकि आप रसीद कटवाकर कैमरा ले जा सकते है।  खैर हम अपना आई कार्ड (जिसमे मेरी वर्दी वाली फोटो है ) दिखाकर मोबाइल ले जाने की जुगाड़ में सफल रहे।  हालाँकि हमे सीसीटीवी से बचाकर फोटो खींचने की सलाह दी गयी।  
अब कुछ जानकारी इस महाविहार के बारे में .... 
यह विहार मुख्‍य विहार या महाबोधि विहार के नाम से भी जाना जाता है। इस विहार की बनावट सम्राट अशोक द्वारा स्‍थापित स्‍तुप के समान है। इस विहार में गौतम बुद्ध की एक बहुत बड़ी मूर्त्ति स्‍थापित है। यह मूर्त्ति पदमासन की मुद्रा में है। यहां यह अनुश्रुति प्रचिलत है कि यह मूर्त्ति उसी जगह स्‍थापित है जहां गौतम बुद्ध को ज्ञान बुद्धत्व (ज्ञान) प्राप्‍त हुआ था। विहार के चारों ओर पत्‍थर की नक्‍काशीदार रेलिंग बनी हुई है। ये रेलिंग ही बोधगया में प्राप्‍त सबसे पुराना अवशेष है। इस विहार परिसर के दक्षिण-पूर्व दिशा में प्रा‍कृतिक दृश्‍यों से समृद्ध एक पार्क है जहां बौद्ध भिक्षु ध्‍यान साधना करते हैं। आम लोग इस पार्क में विहार प्रशासन की अनुमति लेकर ही प्रवेश कर सकते हैं। हालाँकि हम इस बात से अनजान थे , इसलिए बिना अनुमति के प्रवेश कर गए , फिर वहां खड़े बिहार पुलिस के जवानों को एक बार फिर अपना आई कार्ड दिखाकर काम चलाना पड़ा।  
विश्‍वास किया जाता है कि महाबोधि मंदिर में स्‍थापित बुद्ध की मूर्त्ति संबंध स्‍वयं बुद्ध से है। कहा जाता है कि जब इस मंदिर का निर्माण किया जा रहा था तो इसमें बुद्ध की एक मूर्त्ति स्‍थापित करने का भी निर्णय लिया गया था। लेकिन लंबे समय तक किसी ऐसे शिल्‍पकार को खोजा नहीं जा सका जो बुद्ध की आकर्षक मूर्त्ति बना सके। सहसा एक दिन एक व्‍यक्‍ित आया और उसे मूर्त्ति बनाने की इच्‍छा जाहिर की। लेकिन इसके लिए उसने कुछ शर्त्तें भी रखीं। उसकी शर्त्त थी कि उसे पत्‍थर का एक स्‍तम्‍भ तथा एक लैम्‍प दिया जाए। उसकी एक और शर्त्त यह भी थी इसके लिए उसे छ: महीने का समय दिया जाए तथा समय से पहले कोई मंदिर का दरवाजा न खोले। सभी शर्त्तें मान ली गई लेकिन व्‍यग्र गांववासियों ने तय समय से चार दिन पहले ही मंदिर के दरवाजे को खोल दिया। मंदिर के अंदर एक बहुत ही सुंदर मूर्त्ति थी जिसका हर अंग आकर्षक था सिवाय छाती के। मूर्त्ति का छाती वाला भाग अभी पूर्ण रूप से तराशा नहीं गया था। कुछ समय बाद एक बौद्ध भिक्षु मंदिर के अंदर रहने लगा। एक बार बुद्ध उसके सपने में आए और बोले कि उन्‍होंने ही मूर्त्ति का निर्माण किया था। बुद्ध की यह मूर्त्ति बौद्ध जगत में सर्वाधिक प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त मूर्त्ति है। वर्तमान मेंस्वर्णिम मूर्ति के पीछे हीरों से जड़ा आभामंडल है।  महाविहार के शिखर को थाईलैंड के सम्राट द्वारा हाल ही में सोने से मढ़वाया गया है।   नालन्‍दा और विक्रमशिला के मंदिरों में भी इसी मूर्त्ति की प्रतिकृति को स्‍थापित किया गया है।
इस विहार परिसर में उन सात स्‍थानों को भी चिन्हित किया गया है जहां बुद्ध ने ज्ञान प्राप्‍ित के बाद सात सप्‍ताह व्‍यतीत किया था। जातक कथाओं में उल्‍लेखित बोधि वृक्ष भी यहां है। यह एक विशाल पीपल का वृक्ष है जो मुख्‍य विहार के पीछे स्थित है। बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्‍त हुआ था। वर्तमान में जो बोधि वृक्ष वह उस बोधि वृक्ष की पांचवीं पीढी है। इसी वृक्ष की एक कलम सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को देकर श्रीलंका भेजा था , जहाँ आज भी अनुराधापुर में वो बोधि वृक्ष लगा हुआ है।  बौद्ध अनुयायी इस वृक्ष को बहुत ही पवित्र मानते है।  पहले इसकी पत्तियों को तोड़ने में होड़ लग जाती थी , इसलिए इसे घेर दिया है , और इसको छूने की भी मनाही है।  लेकिन यदि वृक्ष से कोई पत्ती स्वयं ही टूट कर गिरती है  तो अभी भी उसे लूटने की होड़ अच् जाती है।  संयोग से हमारे सामने भी एक पत्ती टूटकर गिरी , इस बात से पहले से परिचित मेरी पत्नी ने बिना मौका गवांये उस पत्ती को लपक लिया।  बाकी लोग देखते ही रह गए।  बोधि वृक्ष के नीचे और आसपास बहुत सरे लामा ध्यान लगाए हुए थे ।  विहार समूह में सुबह के समय घण्‍टों की आवाज मन को एक अजीब सी शांति प्रदान करती है।
 मुख्‍य विहार के पीछे बुद्ध की लाल बलुए पत्‍थर की 7 फीट ऊंची एक मूर्त्ति है। यह मूर्त्ति विजरासन मुद्रा में है। इस मूर्त्ति के चारों ओर विभिन्‍न रंगों के पताके लगे हुए हैं जो इस मूर्त्ति को एक विशिष्‍ट आकर्षण प्रदान करते हैं। कहा जाता है कि तीसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व में इसी स्‍थान पर सम्राट अशोक ने हीरों से बना राजसिहांसन लगवाया था और इसे पृथ्‍वी का नाभि केंद्र कहा था। इस मूर्त्ति की आगे भूरे बलुए पत्‍थर पर बुद्ध के विशाल पदचिन्‍ह बने हुए हैं। बुद्ध के इन पदचिन्‍हों को धर्मचक्र प्रर्वतन का प्रतीक माना जाता है।बुद्ध ने ज्ञान प्राप्‍ित के बाद दूसरा सप्‍ताह इसी बोधि वृक्ष के आगे खड़ा अवस्‍था में बिताया था। यहां पर बुद्ध की इस अवस्‍था में एक मूर्त्ति बनी हुई है। इस मूर्त्ति को अनिमेश लोचन कहा जाता है। मुख्‍य विहार के उत्तर पूर्व में अनिमेश लोचन चैत्‍य बना हुआ है।मुख्‍य विहार का उत्तरी भाग चंकामाना नाम से जाना जाता है। इसी स्‍थान पर बुद्ध ने ज्ञान प्राप्‍ित के बाद तीसरा सप्‍ताह व्‍यतीत किया था। अब यहां पर काले पत्‍थर का कमल का फूल बना हुआ है जो बुद्ध का प्रतीक माना जाता है।महाबोधि विहार के उत्तर पश्‍िचम भाग में एक छतविहीन भग्‍नावशेष है जो रत्‍नाघारा के नाम से जाना जाता है। इसी स्‍थान पर बुद्ध ने ज्ञान प्राप्‍ित के बाद चौथा सप्‍ताह व्‍यतीत किया था। दन्‍तकथाओं के अनुसार बुद्ध यहां गहन ध्‍यान में लीन थे कि उनके शरीर से प्रकाश की एक किरण निकली। प्रकाश की इन्‍हीं रंगों का उपयोग विभिन्‍न देशों द्वारा यहां लगे अपने पताके में किया है।बुद्ध ने मुख्‍य विहार के उत्तरी दरवाजे से थोड़ी दूर पर स्थित अजपाला-निग्रोधा वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्‍ित के बाद पांचवा सप्‍ताह व्‍य‍तीत किया था। बुद्ध ने छठा सप्‍ताह महाबोधि विहार के दायीं ओर स्थित मूचालिंडा झील  के नजदीक व्‍यतीत किया था। यह झील  चारों तरफ से वृक्षों से घिरा हुआ है। इस झील  के मध्‍य में बुद्ध की मूर्त्ति स्‍थापित है। इस मूर्त्ति में एक विशाल सांप बुद्ध की रक्षा कर रहा है। इस मूर्त्ति के संबंध में एक दंतकथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार बुद्ध प्रार्थना में इतने तल्‍लीन थे कि उन्‍हें आंधी आने का ध्‍यान नहीं रहा। बुद्ध जब मूसलाधार बारिश में फंस गए तो सांपों का राजा मूचालिंडा अपने निवास से बाहर आया और बुद्ध की रक्षा की।इस विहार परिसर के दक्षिण-पूर्व में राजयातना वृ‍क्ष है। बुद्ध ने ज्ञान प्राप्‍ित के बाद अपना सांतवा सप्‍ताह इसी वृक्ष के नीचे व्‍यतीत किया था। यहीं बुद्ध दो बर्मी (बर्मा का निवासी) व्‍या‍पारियों से मिले थे। इन व्‍यापारियों ने बुद्ध से आश्रय की प्रार्थना की। इन प्रार्थना के रूप में बुद्धमं शरणम् गच्‍छामि (मैं बुद्ध को शरण जाता हू) का उच्‍चारण किया। इसी के बाद से यह प्रार्थना प्रसिद्ध हो गई।
  महाबोधि महाविहार या मंदिर में चारो और भगवान् बुद्ध और उनके अवतारों , पूर्वजन्मों से सम्बंधित शिल्प उत्कीर्ण है।  मंदिर के शिखर को हाल ही में थाईलैंड के सम्राट ने सोने से मढ़वाया है।  अंदर ध्यानमग्न भगवान की मनमोहक प्रतिमा विराजमान है।  प्रतिमा पर भी सोने का कार्य किया गया है।  प्रतिमा के पीछे आभामंडल को छोटे-छोटे हीरों से सजाया गया है , जिससे प्रतिमा की सुंदरता और अधिक बढ़ जाती है।  मंदिर के गर्भगृह के असीम शांति का अनुभव होता है।  मंदिर के बाहर बौद्ध भिक्षु अपनी अपनी भाषाओँ में प्रार्थना करते हुए वातावरण को दिव्यता प्रदान कर रहे है।  महाबोधि मंदिर के बाद हम 80 फुट के भगवान को देखने निकल पड़े।  

तिब्‍बतियन मठ (80 फ़ीट के बुद्ध )

(महाबोधि विहार के पश्‍िचम में पांच मिनट की पैदल दूरी पर स्थित) जोकि बोधगया का सबसे बड़ा और पुराना मठ है 1934 ई. में बनाया गया था। बर्मी विहार (गया-बोधगया रोड पर निरंजना नदी के तट पर स्थित) 1936 ई. में बना था। इस विहार में दो प्रार्थना कक्ष है। इसके अलावा इसमें बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा भी है। यह भारत की सबसे ऊंचीं बुद्ध मूर्त्ति जो कि 6 फीट ऊंचे कमल के फूल पर स्‍थापित है। यह पूरी प्रतिमा एक 10 फीट ऊंचे आधार पर बनी हुई है। स्‍थानीय लोग इस मूर्त्ति को 80 फीट ऊंचा मानते हैं। विशाल प्रतिमा के दोनों तरह कतारवद्ध रूप में बुद्ध शिष्यों की खड़े रूप में प्रतिमाएं है।  जिनमे आनंद , महामोदगयालयन , सारिपुत्र आदि प्रमुख है।
अब विशाल प्रतिमा के बाद हम लोगो ने बोधगया के अन्य बौद्ध मंदिरों की और किया। बोधगया में अलग अलग बौद्ध देशों ने अपनी संस्कृति और स्थापत्य के अनुसार अपने अलग बौद्ध मंदिर या विहार बना रखे है।  इन मंदिरों में उन देशों की संस्कृति की न केवल झलक मिलती है , बल्कि ऐसा लगता है , कि उसी देश में खड़े है।  अगर भारतीय पर्यटक न मिले तो एक पल को लगने लगता है , कि भारत में नहीं है।  चलिए आपको कुछ महाविहारों में घुमा लेट है।  विशाल प्रतिमा से सटा हुआ ही थाई मठ है (महाबोधि विहार परिसर से 1किलोमीटर पश्‍िचम में स्थित)। इस मठ के छत की सोने से कलई की गई है। इस कारण इसे गोल्‍डेन मठ कहा जाता है। इस मठ की स्‍थापना थाईलैंड के राजपरिवार ने बौद्ध की स्‍थापना के 2500 वर्ष पूरा होने के उपलक्ष्‍य में किया था। इंडोसन-निप्‍पन-जापानी मंदिर (महाबोधि मंदिर परिसर से 11.5 किलोमीटर दक्षिण-पश्‍िचम में स्थित) का निर्माण 1972-73 में हुआ था। इस विहार का निर्माण लकड़ी के बने प्राचीन जापानी विहारों के आधार पर किया गया है। इस विहार में बुद्ध के जीवन में घटी महत्‍वपूर्ण घटनाओं को चित्र के माध्‍यम से दर्शाया गया है। चीनी विहार (महाबोधि मंदिर परिसर के पश्‍िचम में पांच मिनट की पैदल दूरी पर स्थित) का निर्माण 1945 ई. में हुआ था। इस विहार में सोने की बनी बुद्ध की एक प्रतिमा स्‍थापित है। इस विहार का पुनर्निर्माण 1997 ई. किया गया था। जापानी विहार के उत्तर में भूटानी मठ स्थित है। इस मठ की दीवारों पर नक्‍काशी का बेहतरीन काम किया गया है। यहां सबसे नया बना विहार वियतनामी विहार है। यह विहार महाबोधि विहार के उत्तर में 5 मिनट की पैदल दूरी पर स्थित है। इस विहार का निर्माण 2002 ई. में किया गया है। इस विहार में बुद्ध के शांति के अवतार अवलोकितेश्‍वर की मूर्त्ति स्‍थापित है।
लुम्बनी के राजकुमार जब अपनी पत्नी को त्यागकर बोधगया की भूमि में आये तो उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई , और हमें इस पुण्यभूमि पर पत्नी की प्राप्ति हुई।  बोधगया में आप एक साथ एक ही जगह पर कई बौद्ध देशो की संस्कृति से परिचित हो सकते है।  बोधगया आने के लिए सड़क, रेल और वायुमार्ग सभी से बढ़िया व्यवस्थाएं है।  नजदीकी रेलवे स्टेशन गया है , जो मुगलसराय - हावड़ा रेलखंड का एक महत्वपूर्ण रेलवे जंक्शन है।  यहां के लिए पुरे देश से रेलगाड़ी चलती है।  जबकि सड़क मार्ग से आप राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 2 जिसे ग्रैंड ट्रंक रोड भी कहते है , से गया आ सकते है। वायु सेवा के लिए बोधगया में ही सुजाता अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है।  रुकने के लिए हर तरह के होटल , धर्मशालाएं है।  बोधगया की तुलना में गया में सस्ते होटल आराम से मिल जाते है।    

महाबोधि मंदिर की ओर जाने वाला रास्ता 

महाबोधि मंदिर का मुख्य द्वार
प्रवेश द्वार के पास हम लोग
सारे जहाँ से अच्छा ....
कुछ देर आराम कर लिया जाये
जापानी बौद्ध विहार
80 फुट के भगवान बुद्ध 
80 फुट के बुद्ध प्रतिमा के दोनों ओर उनके प्रमुख शिष्यों की प्रतिमाएं 
भूटान के  बौद्ध विहार के  सामने 
भूटान  के बौद्ध बिहार के अंदर 
थाई बौद्ध विहार के दर्शन 

ये लो हम थाईलैंड पहुँच गए 

शनिवार, 7 अक्तूबर 2017

वीर सिंह ने दोस्ती निभाने के लिए किया अबुल फज़ल का क़त्ल (ओरछा गाथा -5 )

माँ बेतवा से साक्षात्कार 
नमस्कार मित्रों ,
अभी तक आपने मेरे द्वारा लिखी गयी ओरछा गाथा के सभी भाग उम्मीद  से अधिक न केवल पसंद किये बल्कि इतना प्रोत्साहित किया कि मैं इस गाथा को इस मुकाम तक ला पाया।  मेरी यह ओरछा गाथा मेरे ब्लॉग की सबसे लोकप्रिय पोस्ट साबित हुई।  रामराजा सरकार और माँ  बेतवा की असीम कृपा सदैव साथ रही।  अभी तक के भागों में आपने माँ बेतवा की जुबानी से बुन्देलाओं का जन्म , बुंदेलखंड की स्थापना , प्रथम राजधानी गढ़कुंडार से लेकर द्वितीय राजधानी ओरछा की स्थापना , ओरछा में अयोध्या से रामराजा का आगमन , रायप्रवीण को अकबर को झुकाना आदि कहानी सुनी अब उससे आगे...... 

बहुत दिनों के बाद आज फुरसत में माँ बेतवा से मिलने का मौका मिला।  कुछ विभागीय व्यस्तता रही तो कुछ अपना आलसी स्वाभाव  भी रहा।  खैर माँ से बेटा कब तक दूर रहता।  माँ की पुकार पर आखिरकार समय निकाल ही लिया।  चांदनी रात में चंदा  मामा ऊपर आसमान में मुस्कुराते से अपनी चंद्र किरणों को माँ बेतवा के लहराते आँचल पर बिखेर रहे थे।  इधर जमीन पर हम ग्रेनाइट की चट्टानों बैठे हुए माँ से संवाद की प्रतीक्षा में लहराती -बल खाती चट्टानों से टकराती बाल-सुलभ चंचलता वाली लहरों के सौन्दर्य में खोये थे।  अभी तक माँ बेतवा ने मुझे ओरछा के उत्थान से लेकर रामराजा के अयोध्या से ओरछा आने की कथा , रायप्रवीण की सौंदर्य और प्रवीणता की कहानी सुनाई थी।  मैं अपने भाग्य पर इठला रहा था  कि मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पूण्य सलिला माँ वेत्रवती (बेतवा ) ने मुझे ओरछा-गाथा सुनाने के लिए चुना।  और इसी ओरछा गाथा की वजह से देश के लगभग 14 राज्यों के घुमक्कडों का महामिलन भी बेतवा तट पर करने और मेजबान बनने का सुअवसर मिला। इस ओरछा गाथा ने न केवल ओरछा को सोशल मीडिया पर चर्चित किया  बल्कि मुझ जैसे यदा-कदा  ब्लॉगर को स्तरीय ब्लॉगर बनने की प्रेरणा मिली।  इसी ओरछा गाथा की वजह से बड़े घुमक्कड़ और ब्लॉगर जगत में मुझ नाचीज ओ एक पहचान मिली।  कुछ मित्रों का कहना है, कि मेरी वजह से ओरछा का नाम हुआ , मगर असलियत में ओरछा गाथा से मुझे पहचान मिली।  चाँदनी रात में ठंडी-ठंडी हवाओं में मैं इन्ही विचारों में खोया हुआ था , मेरे बांये और से एक लहर उठी और मेरे सर के ऊपर से इस तरह से निकल गयी जैसे कोई माँ अपने बच्चे के सर के ऊपर दुलार से हाथ फेर रही हो।  इस जाने-पहचाने अहसास से मेरे ह्रदय के अंतिम छोर तक प्रफुल्लता समा गयी। माँ बेतवा अपनी ममतामयी आवाज़ में बोली - पुत्र ! तुम्हारा बहुत दिनों बाद आगमन हुआ , फिर भी स्वागत है ! और कैसे हो वत्स ?
माँ की आवाज़ से ही कानों में मिसरी सी घुल गयी थी।  मैंने माँ बेतवा के जल को स्पर्श कर आशीर्वाद लिया  और अपना कुशल मंगल सुनाया।  और अधूरी पड़ी ओरछा गाथा को आगे बढ़ाने का निवेदन किया।
माँ बेतवा - पुत्र ! पिछली बार हमने रायप्रवीण की प्रवीणता के आगे मुग़ल बादशाह अकबर को झुकते देखा था।  अब कहानी मुग़ल काल में आगे बढ़ेगी।  जैसा कि पिछली बार देखा था, भले ही अकबर ने अपने साम्राज्य का विस्तार नर्मदा के आगे दक्कन तक कर लिया था , मगर बुंदेलखंड अभी भी बुन्देलाओं की जागीर था।  महाराज मधुकर शाह के सुपुत्र वीरसिंह बुंदेला वर्तमान दतिया (म प्र)  के  पास बड़ौनी जागीर के जागीरदार थे।  आगरा  में मुगले  आज़म जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर को गद्दी  पर बैठे हुए काफी वक़्त हो चुका था , उसके बेटों में गद्दी के लिए बेकरारी बढ़ने लगी।  सबसे बड़े बेटे सलीम ने तो अपने वालिद बादशाह अकबर के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक  दिया।  अकबर  इलाहाबाद के किले में छिपे अपने अपने बेटे सलीम को सबक सिखाने के लिए अपने सेनापति और मशहूर साहित्यकार (आईने अकबरी और अकबरनामा का का लेखक ) और अकबर के नवरत्नों  में से एक अबुल फज़ल के नेतृत्व में बड़ी सेना भेजी।  ये खबर वीरसिंह बुंदेला को  पता  चल  गयी।  और वीर सिंह बुंदेला ने अपने मंत्री और सलाहकार चंपतराय से सलाह ली और इसे एक बेहतरीन मौका मानते हुए ग्वालियर के पास आतरी गांव में अबुल फजल की हत्या कर दी और उसका सिर इलाहाबाद के किले में शहजादे सलीम के सामने अपनी दोस्ती के तोहफे के रुप में किया । शहजादा सलीम वीर सिंह जूदेव के इस कारनामे से बहुत ही खुश हुए और उन्होंने बीर सिंह को अपना दोस्त बनाया । इस तरह बुंदेलों और मुगलों के बीच दोस्ती का एक नया रिश्ता कायम हुआ ।
                                                    आगे चलकर अकबर की मृत्यु के बाद जब शहजादा सलीम  हिंदुस्तान की गद्दी पर मुगल बादशाह के रूप में जहांगीर नाम से बैठे, तो उन्होंने इस दोस्ती को और मजबूत किया और वीर से को ओरछा का राजा घोषित किया । एक बार  जहांगीर  अपने दक्षिण अभियान  से  लौटते समय  वीर सिंह जूदेव  के  अनुरोध पर ओरछा में एक  विशेष महल में ठहरे । इस महल का निर्माण बुंदेला स्थापत्य और मुगल स्थापत्य के सुंदर संयोजन के साथ किया गया पूरे देश में इस तरह के हिंदू और मुस्लिम मिश्रित स्थापत्य के कॉल 127 इमारते हैं, जिनमें वीर सिंह बुंदेला द्वारा बनवाया गया यह जहांगीर महल अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है । जहांगीर महल जहां पत्थर पर की गई अद्भुत नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है, वही इसकी पत्थर की सुंदर जालियां भी देशी और विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं । वीर सिंह जूदेव ने जहांगीर महल की दूसरी तरफ ठीक ओरछा के दूसरे छोर पर एक पहाड़ी के ऊपर लक्ष्मी नारायण मंदिर का निर्माण कराया जिसका स्थापत्य अपने आप में अनूठा है. इस मंदिर को लक्ष्मी के वाहन उल्लू की आकृति में पंख फैलाए हुए बनाया गया ,इसके मुख्य द्वार के ऊपर चोंच द्वारा यह स्पष्ट परिलक्षित होता है । सामने से देखने पर यह मंदिर त्रिभुजाकार नजर आता है परंतु वास्तव में यह चतुर्भुज आकार में है और प्रत्येक भुजा की शिखर पर सहस्त्रदल अंकन है । वर्तमान में यह मंदिर अपनी चित्रकारी के लिए प्रसिद्ध है । वीर सिंह जूदेव के परवर्ती शासकों ने इस मंदिर की दीवारों पर अद्भुत चित्रकारी करवाई जिनमें रामायण,महाभारत के अलावा लोकजीवन, सैन्य जीवन और युद्धों का बड़ा ही मनोहारी चित्रांकन है ।
            वीर सिंह जूदेव बुंदेला साम्राज्य के सभी शासकों में ना केवल सबसे ज्यादा प्रसिद्ध थे , बल्कि योग्य शासक भी थे । वीर सिंह जूदेव ने ओरछा के साथ साथ आसपास के इलाकों में कई महल और किले बनवाएं । वीर सिंह जू देव के समय में बुंदेला स्थापत्य मुस्लिम स्थापत्य के सुंदर संयोजन के साथ और निखरकर सामने आया । बीर सिंह ने ओरछा का किला, झांसी का किला, दतिया का किला दतिया में वीर सिंह महल, धामोनी का किला और आसपास की कई सुंदर इमारतें बनवाई ।
मां बेतवा के मुंह से मैं बड़े ही इत्मीनान से ओरछा के राजा वीर सिंह जूदेव के बारे में सुन रहा था , पर झांसी के किले का नाम सुनकर मेरे कान खड़े हुए और अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए मैंने मां बेतवा से प्रश्न पूछा कि मैं झांसी का किला तो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के लिए प्रसिद्ध है तो मेरे ख्याल से तो इसे मराठों ने बनवाया होगा ?
मां वेत्रवती मेरी अज्ञानता पर हल्की सी मुस्कुराई जिसका बताओ मुझे लहरों में हुई हलचल से पता चला ।
 मां बोली- पुत्र मराठे बाद में आये । झांसी शहर की स्थापना भी बुंदेलों द्वारा कराई गई और झांसी का किला भी  वीर सिंह जूदेव द्वारा बनवाया गया । अभी कुछ समय पहले एक फिल्म आई थी बाजीराव मस्तानी शायद तुमने भी देखी होगी ।
मां वेत्रवती के मुंह से फिल्म का नाम सुनकर मुझे थोड़ी सी हैरानी हुई परंतु अभी मेरा ध्यान अपनी जिज्ञासा को शांत करने में था, इसलिए मैंने सिर्फ हामी मैं सिर हिलाया। मां आगे बोली इस फिल्म में दिखाया गया कि वीर छत्रसाल जब बुजुर्ग हो गए और उन पर मुगलों ने आक्रमण किया तब उन्होंने बाजीराव पेशवा की सहायता ली और विजय उपरांत उन्हें  बुंदेलखंड का कुछ  क्षेत्र भी 1728 में मराठों को दिया तबसे मराठे  बुंदेलखंड में अंग्रेजों के आने तक राज करते रहे ।
मां के उत्तर से मैं संतुष्ट तो हो गया परंतु बुंदेलों और मराठाओं को छोड़कर मेरे मन में बाजीराव मस्तानी फिल्म की बात घुमने लगी कि आखिर मां वेत्रवती को इस फिल्म की जानकारी कैसे है ?
जब रहा न गया तो मैंने मां बेतवा से आखिरकार पूछी लिया कि माते आपको फिल्मों के बारे में जानकारी कैसे ?
मेरे इस प्रश्न पर मां बेतवा ने अट्टहास किया जिसकी गर्जना मुझे लहरों के साथ सुनाई दी । मां बोली पुत्र तुम मुझसे सदियों पुरानी कहानी सुन रहे हो ,जब मैं इतिहास से परिचित हूं तो क्या वर्तमान से अनभिज्ञ होउंगी ? ना तो मैं फिल्म देखने जाती हूं और ना ही किसी से कुछ पूछने जाती  हूं , मेरे किनारे जो मुसाफिर आते हैं ,  सदियों से उनके ही द्वारा मुझे इतिहास वर्तमान और भविष्य का ज्ञान होता रहता है । हां तुम जैसा जिज्ञासु बहुत कम आता है कि जो मुझसे प्रश्न पूछता है ! वरना मैं तो बस लोगों की सुनती रहती हूं और बहती रहती हूं । चलो तो फिर हम इतिहास के अनंत सागर में फिर से गोता लगाते हैं । वीर सिंह जूदेव बुंदेला साम्राज्य का ना केवल विस्तार कर रहे थे, बल्कि बुंदेला साम्राज्य का समग्र विकास भी कर रहे थे । उनके राज्य में प्रजा भी बहुत सुखी और संपन्न । वीर सिंह जूदेव के बारे में इतना सुनकर मुझे भी बड़ा अच्छा लगा  । चलिए जिन्हें इतिहासकारों द्वारा भुला दिया गया ऐसे प्रजावत्सल शासकों के बारे में तो पता चला । मैंने मां बेतवा से राजा वीर सिंह जूदेव की प्रजावत्सलता की कोई घटना सुनाने का आग्रह किया ।
मेरा आग्रह सुनकर मां बेतवा फिर से अतीत की गहराइयों में गोता लगाने चली गई और काफी देर तक लहरों में कोई हलचल नहीं हुई,आकाश में टिमटिमाते तारे स्थिर जल में इस तरह प्रतीत हो रहे थे , कि मानो आज सारी आकाशगंगा के तारे बेतवा स्नान करने बेतवा के जल में एक साथ उतर आए हो !
अचानक मां बेतवा का स्थिर जल  हिलोरे लेने लगा और एक लहर मेरे समीप से इस तरह से गुजरी जैसे मां ने अपने बच्चों के गालों को वात्सल्य भाव से सहलाया हो ।
मां बेतवा बोली पुत्र राजा वीर सिंह जूदेव का एक पुत्र बाघबहादुर  एक दिन जंगल में शिकार खेलने गया और एक हिरण का पीछा करते करते वह काफी दूर निकल गया और हिरन उसकी आंखों से ओझल हो गया । तभी राजपुत्र ने देखा कि एक योगी इस घने जंगल में तपस्यारत हैं, तो उसने सोचा अवश्य ही इन्होंने मेरे शिकार को भागते हुए देखा होगा । अतः योगी के समीप पहुंचकर राजपुत्र बाघबहादुर  ने योगी से अपने शिकार के बारे में पूछा । परंतु योगी मौन व्रत किए हुए थे, इसलिए उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया । दिन भर से भूखे-प्यासे शिकार के पीछे भागते हुए राजपुत्र बाघबहादुर  बुरी तरह से थक चुका था अतः योगी द्वारा कोई उत्तर ना दिए जाने पर वह क्रोधित हो गया और उसने अपने शिकारी कुत्तों को योगी पर छोड़ देने का आदेश दिया । आदेश का पालन होते ही शिकारी कुत्ते तपस्यारत योगी पर झपट पड़े और कुछ ही देर में योगी का निधन हो गया । जब यह बात वीर सिंह जूदेव तक पहुंची तो उन्होंने दूसरे दिन भरे राजदरबार में सबके सामने अपने पुत्र बाघबहादुर के इस अक्षम्य अपराध की सजा सुनाते हुए कहा कि इस दुष्ट ने जिस तरह इन भूखे कुत्तों को उन आदरणीय योगी के ऊपर छोड़ा उसी तरह  बाघबहादुर जीरों में बांधकर इन भूखे शिकारी कुत्तों के सामने डाल दिया जाए । तो पुत्र आज जहां वर्तमान शासक पुत्र मोह में देश की दुर्गति कर रहे हैं, वही वीर सिंह जूदेव न्याय का एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपने स्वयं के पुत्र को मृत्युदंड दिया ।
इतना कहकर माँ बेतवा शांत हो गयी ,उनकी लहरें अब पहले की तरह मचल नहीं रही थी ! लेकिन अभी तक अपने अनुभव से मैं इतना तो समझ ही गया था , कि ये शांति सिर्फ ऊपर ही ऊपर की है।  अंदर घनघोर मंथन चल रहा होगा , या माँ अपनी यादों के भंवर से कोई अद्भुत रहस्य निकालने गयी होंगी।  जब तक पुनः अपने साथ फिर किसी कहानी को लेकर नहीं आती , आप भी मेरी तरह प्रतीक्षा कीजिये न जाने क्या  मिल जाये ....... 
पावन माँ वेत्रवती गंगा (बेतवा)
बेतवा की एक शाम 
वीरसिंह जूदेव और जहांगीर की दोस्ती की मिसाल जहांगीर महल 
बेतवा तट पर बनी वीरसिंह जूदेव की छतरी (समाधि )
जहांगीर महल का भव्य द्वार 

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

हेलीकॉप्टर से माता वैष्णो देवी की यात्रा (भाग 1)

नमस्कार मित्रों, बहुत दिनों के बाद ब्लॉग लिखने बैठा हूँ।  इस 29 जुलाई को मेरे पिताजी असमय ही एक दुर्घटना में हम सब को छोड़कर अनंत यात्रा पर निकल गए। इस कारण  मन बड़ा ही अशांत और दुखी है।  आज की यह पोस्ट मैं अपने पापा जी को समर्पित कर रहा हूँ।  हो सकता है, कि मेरी इस पोस्ट में भावनाएं ज्यादा हो।  पापा जी के साथ पूरे परिवार  ने एक साथ आखिरी यात्रा  इस अप्रैल को की थी।  इस बार मेरे सबसे छोटे भाई अभिषेक (मोनू ) के कारण  ही माता वैष्णो देवी की यात्रा का कार्यक्रम बन पाया था।  हम लोग वैष्णो देवी की यात्रा पर दूसरी बार जा रहे थे।  पिछली बार मोनू अपनी परीक्षा के कारण  पूरे  परिवार के साथ वैष्णो देवी नहीं जा पाया था।  इसलिए पिछले कई वर्षों से वह सपरिवार यात्रा के लिए प्रयासरत था।  लेकिन हर बार किसी न किसी कारण से माता का बुलावा नहीं आ पा रहा था।  खैर इस बार भी जैसे-तैसे कई विघ्नो के बाद अंततः 9  अप्रैल  जाने का तय हो गया था।  मम्मी -पापा , मंझला भाई निकेश (सोनू ) और मोनू  हिमगिरि एक्सप्रेस से बक्सर से आ रहे थे  मैं ,  मेरी पत्नी निभा , एक वर्षीय पुत्र अनिमेष और नाना जी ओरछा से लखनऊ पहुंचे।  वहां से हमने हिमगिरि एक्सप्रेस में पूरे परिवार का संग पा लिया।  हमारी ट्रैन अपनी रफ़्तार से चली जा रही थी , और साथ ही चल रहा था , यादों का कारवां ! हमारा पूरा परिवार एक साथ बहुत काम ही मौकों पर मिल पाता है।  इसलिए ये यात्रा भी हमारे  लिए किसी उत्सव से कम नहीं थी।  पूरे परिवार के साथ मेरी पत्नी और नन्हे बालक अनिमेष की पहली यात्रा थी।  अनिमेष के लिए तो नाना जी, पापा जी और मम्मी के साथ सोनू-मोनू हाथों हाथ लिए थे।  खैर 10 अप्रैल को हम सभी लोग जम्मू तवी रेलवे स्टेशन उतरे।  पिछली बार हमने जम्मू में ही होटल लिया था , फिर बस से कटरा गए थे।  लेकिन इस बार तो जम्मू से कटरा के लिए रेल लाइन चालू हो गयी थी।  तो फिर बस और टैक्सी  वालों की छुट्टी हो गयी।  हमारे वाहट्सएप्प और फेसबुक ग्रुप "घुमक्कड़ी दिल से "  सदस्य और मित्र प्रकाश यादव जी की सलाह से हमने भी कटरा रुकने का निश्चय किया।  प्रकाश जी ने अपने संपर्क से कटरा में हमारे लिए होटल भवानी इंटरनेशनल में कमरे  तक बुक करा दिया।  जम्मू से हमने भी ट्रैन पकड़ी।  रस्ते में उधमपुर  स्टेशन  पड़ा , यहां हमारे ग्रुप के ही एक बुजुर्ग सदस्य रमेश शर्मा जी रहते है।  पर जम्मू कश्मीर  में अन्य राज्यों के प्रीपेड सिम काम नहीं करते , इसलिए उनसे नहीं मिल पाए।  खैर कटरा बस स्टैंड के पीछे बने होटल में हम लोग शाम को पहुंचे। रास्ते की थकावट के कारण हमने सुबह चढ़ाई करने  फैसला लिया।  सुबह नानाजी की उम्र और मेरी श्रीमती जी द्वारा चढ़ाई चढ़ने में असमर्थता व्यक्त करने के कारण हमने हेलीकॉप्टर सेवा से जाने का फैसला किया । सुबह जब हेलीकॉप्टर सेवा टिकट काउंटर पर पहुंचे तो काफी भीड़ लगी हुई थी और सिर्फ सीनियर सिटीजन और उनके साथ एक अटेंडेंट कोही टिकट दिया जा रहा था। हालांकि जिन लोगों ने ऑनलाइन टिकट बुक किया था उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई सीधे हेलीपैड पर पहुंच कर बजन कराया और टिकट लेकर उड़ते बने । खैर कुछ देर इंतजार करने के बाद एक आशा बंधी। 1070 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से हमने टिकट खरीदें। यहां आपको एक उचित सलाह देना चाहूंगा कि यदि आपको भी माता वैष्णो देवी हेलीकॉप्टर से जाना है तो अपने साथ जितने भी लोग हैं सभी की आइडेंटी प्रूफ विशेषकर आधार कार्ड जरूर साथ रख ले क्योंकि मेरी मम्मी और श्रीमती के पास कोई आइडेंटी प्रूफ नहीं था जिसे कारण थोड़ी सी परेशानी हुई । पहले से ऑनलाइन टिकट करवाने पर यहां के 3-4 घंटे बच जाते हैं । टिकट कटवाने के बाद हम लोग ऑटो करके हेलीपैड पहुंचे जहां दो अलग अलग हेलीकॉप्टर सेवाओं के लिए दो अलग काउंटर बने हुए थे अलग हमारी टिकट पर हेलीकॉप्टर कंपनी का नाम दर्ज था इसलिए उस कंपनी के काउंटर पर पहुंचे वहां बजन कराया क्योंकि वजन के हिसाब से ही एक बार में सवारियां ले जा रहे थे। ज्यादा वजन के लोग तो कम सवारी और कम वजन के लोग तो ज्यादा सवारी वैसे अधिकतम एक बार में 6 सवारी ही ले जा रहे थे। काउंटर से हम हेलीकॉप्टर कंपनी की गाड़ियों से ऊपर पहाड़ी पर बने हेलीपैड पर पहुंचे। हम 6 लोग दो हेलीकॉप्टर में बैठे । जब हेलीकॉप्टर ऊपर उठना चालू हुआ तो किसी बड़े झूले में बैठने का जो अनुभव होता है उस तरह का अनुभव हमें भी हुआ। हालांकि थोड़ा सा डर भी लग रहा था क्योंकि नीचे बड़े बड़े पहाड़ और खाई थी अगर अगर गिरे तो नीचे नहीं सीधे ऊपर पहुंचते। खैर माता रानी का नाम लिया और डर दूर और हम उड़न छू। सामने सफेद बर्फ की चादर ओढ़े पीरपंजाल की खूबसूरत पहाड़ियां दिख रही थी बहुत ही मनमोहक नजारा था लेकिन जब तक हम इन नजारों को जी भर कर देखते तब तक हम सांझीछत पर बने हेलीपैड पर लैंड करने वाले थे। कुल 15 मिनट की इस हवाई यात्रा का अनुभव निराला था, हमारे 1 साल के सुपुत्र भी इस यात्रा के सहयात्री थे। हमसे पहले वाले हेलीकॉप्टर में मेरे दोनों भाई निकेश और अभिषेक  हेली पैड पर पहुंच चुके थे और अभिषेक ने तो फोटोग्राफी प्रतिबंधित होने के बावजूद हमारे लैंड होने का वीडियो अपने मोबाइल में बनाया। हेलीपैड पर उतरने के बाद लगभग 2 से ढाई किलोमीटर पैदल यात्रा की चढ़ाई बाकी थी । हम लोग जय माता दी के नारे लगाते हुए माता के दरबार की ओर बढ़ने लगे । मेरे साथ एक समस्या यह थी कि मेरा 1 साल का बेटा मेरे अलावा किसी और के पास जा ही नहीं रहा था इसलिए मुझे उससे अपनी गोद में लेकर चढ़ाई करनी पड़ी ।
अब मातारानी क दरबार पहुँचने के  पूर्व उनकी कथा संक्षेप में जानते है।


 वैष्णो देवी उत्तरी भारत के सबसे पूजनीय और पवित्र स्थलों में से एक है। यह मंदिर पहाड़ पर स्थित होने के कारण अपनी भव्यता व सुंदरता के कारण भी प्रसिद्ध है। वैष्णो देवी भी ऐसे ही स्थानों में एक है जिसे माता का निवास स्थान माना जाता है। मंदिर, 5,200 फीट की ऊंचाई और कटरा से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हर साल लाखों तीर्थ यात्री मंदिर के दर्शन करते हैं।यह भारत में तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थस्थल है। वैसे तो माता वैष्णो देवी के सम्बन्ध में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं लेकिन मुख्य 2 कथाएँ अधिक प्रचलित हैं।
Mata Vaishno devi ki kahani
माता वैष्णो देवी की  कथा
मान्यतानुसार एक बार पहाड़ों वाली माता ने अपने एक परम भक्तपंडित श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी लाज बचाई और पूरे सृष्टि को अपने अस्तित्व का प्रमाण दिया। वर्तमान कटरा कस्बे से 2 कि.मी. की दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वह नि:संतान होने से दु:खी रहते थे। एक दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुँवारी कन्याओं को बुलवाया। माँ वैष्णो कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं। पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गई पर माँ वैष्णो देवी वहीं रहीं और श्रीधर से बोलीं- ‘सबको अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ।’ श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस – पास के गाँवों में भंडारे का संदेश पहुँचा दिया। वहाँ से लौटकर आते समय गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य बाबा भैरवनाथ जी के साथ उनके दूसरे शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दिया। भोजन का निमंत्रण पाकर सभी गांववासी अचंभित थे कि वह कौन सी कन्या है जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है? इसके बाद श्रीधर के घर में अनेक गांववासी आकर भोजन के लिए एकत्रित हुए। तब कन्या रुपी माँ वैष्णो देवी ने एक विचित्र पात्र से सभी को भोजन परोसना शुरू किया।
भोजन परोसते हुए जब वह कन्या भैरवनाथ के पास गई। तब उसने कहा कि मैं तो खीर – पूड़ी की जगह मांस भक्षण और मदिरापान करुंगा। तब कन्या रुपी माँ ने उसे समझाया कि यह ब्राह्मण के यहां का भोजन है, इसमें मांसाहार नहीं किया जाता। किंतु भैरवनाथ ने जान – बुझकर अपनी बात पर अड़ा रहा। जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकडऩा चाहा, तब माँ ने उसके कपट को जान लिया। माँ ने वायु रूप में बदलकरत्रिकूट पर्वत की ओर उड़ चली। भैरवनाथ भी उनके पीछे गया। माना जाता है कि माँ की रक्षा के लिए पवनपुत्र हनुमान भी थे। मान्यता के अनुसार उस वक़्त भी हनुमानजी माता की रक्षा के लिए उनके साथ ही थे। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाला और उस जल में अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है, जिसके पवित्र जल का पान करने या इससे स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं।





इस दौरान माता ने एक गुफा में प्रवेश कर नौ माह तक तपस्या की। भैरवनाथ भी उनके पीछे वहां तक आ गया। तब एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है। इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। यह गुफा आज भी अर्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। अर्धक्वाँरी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहाँ माता ने भागते – भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था। गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया। माता ने भैरवनाथ को चेताया और वापस जाने को कहा। फिर भी वह नहीं माना। माता गुफा के भीतर चली गई। तब माता की रक्षा के लिए हनुमानजी ने गुफा के बाहर भैरव से युद्ध किया।
भैरव ने फिर भी हार नहीं मानी जब वीर हनुमान निढाल होने लगे, तब माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का संहार कर दिया। भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से 8 किमी दूर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा। उस स्थान को भैरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है। जिस स्थान पर माँ वैष्णो देवी ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान पवित्र गुफा’ अथवा ‘भवन के नाम से प्रसिद्ध है। इसी स्थान पर माँ काली (दाएँ), माँ सरस्वती (मध्य) और माँ लक्ष्मी (बाएँ) पिंडी के रूप में गुफा में विराजित हैं। इन तीनों के सम्मिलत रूप को ही माँ वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है। इन तीन भव्य पिण्डियों के साथ कुछ श्रद्धालु भक्तों एव जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व नरेशों द्वारा स्थापित मूर्तियाँ एवं यन्त्र इत्यादी है। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने माँ से क्षमादान की भीख माँगी।



माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी, उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएँगे, जब तक कोई भक्त मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा। उसी मान्यता के अनुसार आज भी भक्त माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद 8 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर भैरवनाथ के दर्शन करने को जाते हैं। इस बीच वैष्णो देवी ने तीन पिंड (सिर) सहित एक चट्टान का आकार ग्रहण किया और सदा के लिए ध्यानमग्न हो गईं। इस बीच पंडित श्रीधर अधीर हो गए। वे त्रिकुटा पर्वत की ओर उसी रास्ते आगे बढ़े, जो उन्होंने सपने में देखा था, अंततः वे गुफ़ा के द्वार पर पहुंचे, उन्होंने कई विधियों से ‘पिंडों’ की पूजा को अपनी दिनचर्या बना ली, देवी उनकी पूजा से प्रसन्न हुईं, वे उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया। तब से, श्रीधर और उनके वंशज देवी मां वैष्णो देवी की पूजा करते आ रहे हैं।
लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन के बाहर
निर्माणाधीन चारबाग मेट्रो स्टेशन 
दादा अपने पोते की तस्वीर उतारते हुए 
रास्ते के नजारे 


रास्ते  में एक नदी का दृश्य 
सुरंग से गुजरती हमारी ट्रैन 
हरियाली और रास्ता 
जम्मू से कटरा जाते हुए बीच में मिला उधमपुर स्टेशन 
आखिरकार पहुँच  ही गए 
खूबसूरत कटरा स्टेशन (पीछे त्रिकूट पर्वत )
एक सेल्फी कटरा स्टेशन के बाहर 
रात्रि में कटरा से दिखता  माँ का दरबार 
होटल भवानी इंटरनेशनल , कटरा (जहाँ  हम लोग रुके )

माता के दरवार का रास्ता 
हेलीकाप्टर के लिए पहली पर्ची 

हेलिपैड पर बने काउंटर 
हमारे उड़नखटोले का टिकट 
हमारे उड़नखटोले के पहले दर्शन 
उड़ने की तैयारी 
सांझी छत पर उतरने के बाद माता के दरबार  की ओर  
आज की पोस्ट में इतना ही अगली पोस्ट में माता के दरबार तक की यात्रा। .. तब तक के लिए जय माता दी 

रविवार, 16 जुलाई 2017

पवित्र गुफा में बाबा गुप्तेश्वर नाथ के दर्शन के साथ एक अद्भुत रोमांचक यात्रा (अंतिम भाग )

इस श्रृंखला की पिछली तीन पोस्ट से इतना तो आप जान ही गए होंगे , कि  बाबा गुप्तेश्वर के धाम तक पहुंचना इतना आसान नहीं है।  अगर आपने पिछली पोस्ट नहीं पढ़ी तो नीचे  लिंक दे रहा हूँ , क्लिक करके पढ़ लीजिये तभी असली आनंद आएगा।

 अगर पढ़ चुके है , तो बहुत अच्छी बात है , बम भोले करते हुए आगे बढ़ते है।
                                            तो अँधेरी रात में जंगल के बीच  से कठिनतम चढ़ाई करके हम लोग बोल बम का नारा  लगते हुए आएगी बढे।  कई बाधा  आई पर जब बाबा का सहारा हो तो फिर मुश्किल कैसी  ! अब सुबह हो चुकी थी , बिना पेट खाली  किये हम लोग आगे बढ़ रहे थे , सुबह की ठंडी और सुहावनी बयार की मस्ती में बड़े आराम से चल रहे थे।  पर ये आराम ज्यादा देर नहीं टिका।  अब सूरज नारायण धीरे धीरे उग्र होने लगे थे , और शरीर पसीना छोड़ने लगा था।  रस्ते में कई बरसाती झरने मिले तो ऐसे ही एक झरने पर कुछ लोगो ने नहाया।  अब लगातार चलना मुश्किल हो रहा था , तो सुस्ता -सुस्ता के आगे बढ़ रहे थे।  सुबह से नींबू  वाली चाय के अलावा कुछ नहीं लिया था।  अब सुबह होने से हमें लौटने  वाले बम  भी मिलने लगे , जिन्हे देख कर लगने लगा कि  हम करीब आ गए।  अब हम पहाड़ की कठिन उतराई  उतर चुके थे।  उतरते ही कुछ दुकाने मिली  जहाँ हमने हम लोग नींबू  वाली चाय पीने  रुके या इसी बहाने सुस्ताने लगे।  सबसे बुरी हालत मेरी और संजय सिंह जी की हो चली थी।  हमारी शारीरिक मेहनत की आदत लगभग ख़त्म सी हो गयी है  इसलिए यहां इतना चलना अखर रहा था।  जबकि बाकि लोग मजे से चल रहे थे।  खैर चाय पीकर सब चलने तैयार हो गए , हम दोनों भी मजबूरन चल पड़े।  मन तो बहुत चलने को कर रहा था , मगर तन तो साथ दे। 
                                                           आगे दुर्गावती नदी मिली , ये नदी ऊपर से बहुत खूबसूरत चमकती हुई चाँदी  की लकीर सी दिख रही थी, लेकिन आस आने पर तेज प्रवाहनी थी , इसका कारन एक दिन पहले हुई बारिश थी।  स्थानीय लोगों ने या कहे नक्सलियों ने  सीमेंट के पिलर बनाकर लकड़ियों के द्वारा एक अस्थायी पुल  का निर्माण किया था , जो तेज बारिश में नदी का पानी बढ़ने पर बह जाता है।   अभी तक पुरे रस्ते में हमें दर्शनार्थी ो खूब मिले मगर उनके लिए प्रशासन की तरफ से सुविधा के नाम पर हाथ सलाई शून्य ही मिला।  लेकिन इतनी कठिनाई के बाद भी लोग श्रद्धा और भक्ति के बल पर बाबा के दर्शन करने आते है।  हैरानी की बात इतनी कठिनाई में महिलाएं , बच्चे और बुजुर्ग भी आते है।  खैर अपने जीवन में पहली बार लकड़ी के इस तरह के पुल को देखा था।  इस सेतु के निर्माणकर्ताओं ने बाकायदा टोल बसूलने का इंतजाम कर रखा था।  प्रति व्यक्ति मात्र  दस रुपये।  कुछ लोगों ने बिना पैसे दिए ही नदी की  धार में से नदी पार करने की कोशिश की , मगर धार तेज होने से अंततोगत्वा दस रूपया खर्च कर नदी आर करने में ही भलाई समझी।  हम भी इस रोमांचक जुगाड़ू पुल  से नदी पार की।
                                                        अब चढ़ाई- उतराई की जगह समतल जमीन ने ले ली थी।  पर जंगल साथ ही था।  कुछ किलोमीटर चलने पर पगडण्डी से कुछ चौड़ा रास्ता मिला , जिसमे ट्रेक्टर के चक्के  के निशान भी मिले।  राहगीरों से पूछने पर पता चला कि  ये चेनारी वाला रास्ता है।  बरसात होने के पहले स्थानीय लोग ट्रेक्टर से अपनी दुकानों के सामान और रसद सामग्री ले आते है।  और बरसात होते ही दुर्गावती नदी चेनारी वाला रास्ता बंद कर देती है।  हालाँकि महाशिवरात्रि के समय दोनों रास्ते  खुले होते है।  सावन और फागुन के अलावा बाबा के दर्शन बंद रहते है।  फागुन में आसान रास्ते  से तो आया जा सकता है, मगर प्रकृति की इतनी सुंदरता छूट जाती है। आप कुछ देर के लिए अपनी आंखे बंद कर कल्पना कीजिये, कि आप हरे भरे पहाड़ से गुजर रहे है , आसपास के पेड़-पौधे बारिश से नहाकर आपका स्वागत कर रहे।  चलते-चलते पहाड़ो की चोटियों से झरने फूट  पड़े , उनका झर-झर  का कोलाहल शोर नहीं पैदा कर रहा बल्कि संगीत की मधुर तान लग रहा है , इस संगीत में साथ देने पक्षियों की चहचहाट भी  है।  ऊपर नीले  आसमान में रुई केफाहे से सफ़ेद बादल माहौल को चार चाँद लगा रहे है।  सोचिये जब ये सब कल्पना में ही इतना प्यारा लग रहा है , तो वास्तविकता में कितना अच्छा लगेगा।  तो इन नजारो का लुत्फ़ उठाये हुए हमारा कारवां आगे बढ़ रहा था।  लौट रहे लोगो की एक बात बड़ी अच्छी लगी , कि  जिससे भी पूछो - कितनी दूर और चलना है ?  तो पिछले चार-पांच किलोमीटर से हमें एक ही जवाब मिल रहा था।  बस ज्यादा नहीं एक-दो किलोमीटर ! तो वापिसी कर रहे श्रद्धालु जाने वालों का मनोबल नहीं तोडना चाहते।  हम भी एक-दो किलोमीटर की आस में जब एक-दो किलोमीटर आगे बढ़ते और पूछते तो वही ढाक के तीन पात ! 
                        खैर अब सचमुच बाबा के नजदीक पहुँच गए , क्योंकि अब  दुकानें  ज्यादा मात्रा में दिखने लगी थी।  लोग भी भीड़ के रूप में दिखने लगे थे।  बोल बम का नारा गूंज रहा था।  लेकिन दुकानों तक पहुंचने  दुर्गावती नदी फिर रास्ता रोके बह रही थी , ये नदी तीन चार बार रास्ते  में मिली।  हालाँकि यहां ज्यादा गहरी नहीं थी , तो हमने भी दूसरो  की देखादेखी में पैदल ही नदी पार  की।  नदी के ठन्डे पानी से थकान  भरे पैरों  को बड़ा आराम मिला।  कई लोग यही स्नान कर रहे थे , और यही से जल भर रहे थे।  तो कुछ लोग जंगल के दूसरी तरफ प्लास्टिक के लौटे लेकर जा रहे थे।  एक दुकान पर पूछने पर पता चला।  कि  लोग शीतल कुंड से जल भरकर ला रहे है, और वही स्नान भी कर रहे है।  शीतलकुण्ड की दुरी 100 मीटर जंगल के अंदर बताई।  पर  हम  हिम्मत हार चुके थे।  फिर सोचा जब यहां तक  चुके है, तो 100 मीटर और चल लेते है।  
                                                                               एक दुकान से प्लास्टिक के छोटे छोटे लोटे ख़रीदे ताकि जल भरकर बाबा को चढ़ाया जा सके।  अब मन से चल पड़े क्यूंकि तन तो थक चुका था।  शीतलकुण्ड के नाम से ऐसा लग रहा था , कि  कोई कुंड या पोखर होगा , जिसे शीतलकुण्ड कहा जाता है।  लेकिन वहां पहुंचकर नए नज़ारे देखने मिले।  सामने ऊँचे पहाड़ से दो झरने से पानी रहा था।  नजारा देखकर सारी थकान उड़न छू हो गयी।  पैरों में पंख लग गए।   पहले जहाँ 100 मीटर लम्बी दूरी लग रही अब  दूरी ख़त्म हो गयी।  वास्तव में इस नज़ारे की हमें उम्मीद  ही नहीं थी  ये  हमारे लिए बोनस पॉइंट था  संजय जी  हमे शीतलकुण्ड का जिक्र कर रहे , पर हमारे दिमाग में कुंड ही था , झरना नहीं।  अब हम सब तैयार हो गए जल प्रपात स्नान के लिए।  हमने दो बार में तीन-तीन लोग करके स्नान किया।  तीन लोग स्नान करते बाकी तीन लोग सामान की रखवाली करते हुए फोटो खींच रहे थे।  ऐसी जगहों पर सामान का सुरक्षा करना जरुरी होती , वरना सावधानी हटी और दुर्घटना घटी।  अब जहाँ भारी मन से आये थे , वहां से मन भर ही नहीं रहा था।  हम लोग लगभग डेढ़ घंटे नहाये।  फिर जल लेकर चल पड़े बाबा की गुफा ऒर...  अब थकान गायब हो चुकी थी।
                                                अस्थायी दुकानों से होते हुए हम बाबा गुप्तेश्वरनाथ की रहस्यमयी  गुफा की बढ़ चले।  बाबा गुप्तेश्वर नाथ की गुफा के पहले बाहर एक चबूतरा बनाकर मंदिर जैसा नया  निर्माण किया गया है।  उसके बाद अंदर पूरी गुफा प्राकृतिक है।  गुफा के अंदर जनरेटर के माध्यम से बल्ब जलाकर रौशनी की व्यवस्था की जाती है।  अंदर जाने पर ऑक्सीजन की कमी होने लगती है , इसलिए आपातकालीन व्यवस्था के लिए ऑक्सीजन सिलिंडर की भी व्यवस्था भी की गयी है।  हम लोग भी गुफा के अंदर बाबा का जयकारा लगाकर प्रवेश कर गए।  अंदर  जगह की कमी थी , और बल्ब जलने के कारण  गर्मी भी लग रही थी।  जैसे जैसे गुफा के अंदर जा रहे थे , वैसे ही दम घूंट सा रहा था।  इससे पता चलता है, ऑक्सीजन वाकई में कम हो रही थी।  सबकी साँस अपने आप ही तेज चलने लगी थी।  खैर हम अंदर बाबा गुप्तेश्वरनाथ के समीप पहुँच ही गए।  वहां बाबा का प्राकृतिक शिवलिंग था।  इसका आकार सामान्य शिवलिंग जैसे नहीं था।  शिवलिंग के पास एक दाढ़ी वाले साधु बाबा भी बैठे थे।  आश्चर्य इस बात का कि  सामान्य व्यक्तियों का जहाँ थोड़ी देर में ही दम घुंटने लगा , वहां ये साधु बाबा इतनी देर से कैसे बैठे होंगे ? खैर लोग दम घुटने के कारन जल्दी ही प्लास्टिक वाले लौटे सहित जल चढाकर वापिस लौट रहे थे  शिवलिंग के आसपास बहुत से प्लास्टिक के लौटे पड़े हुए थे।  ये देखकर मुझे बड़ा बुरा लगा।  एक तरफ हम ईश्वर के दर्शन के लिए इतने कष्ट सहनकर यहां तक आये और दूसरी तरफ ईश्वर  के पास उन गन्दगी कर रहे है।  कितनी ओछी मानसिकता है ? हम भी बाबा को जल चढ़ाकर लौटे और साथ अपने प्लास्टिक के लौटे भी वापिस लाये। बाहर वो लौटे दुकानदार को वापिस कर दिए। 
                                                                                 अब दर्शन करने के बाद भोजन की इच्छा जोर मार रही थी।  तो एक अच्छी सी दुकान देखकर डेरा जमाया।  यहां पूड़ी तौलकर मिल रही थी।  अतः हम लोगों ने डेढ़ किलोग्राम पूड़ी और सब्जी के साथ जलेबी का भी आर्डर दिया।  भरपेट भोजन के बाद कुछ देर आराम किया और निकल पड़े वापिसी के लिए।  लौटना भी उसी रस्ते से था, जिससे गए थे।  हाँ ईश्वर ने इतना साथ दिया कि  बारिश होती रही तो ठन्डे ठन्डे मौसम में भीगते हुए वापिस लौटे।  बीच बीच में जब धुप निकल आती थी , तो पसीने में भीग जाते थे।  आखिरी उतराई उतरते समय पैर  कांपने लगे थे , लगा कि कहीं लड़खड़ाकर गिर न जाऊ , मगर बाबा की कृपा से सभी लोग सुरक्षित पनारी पहुँच गए।  इस तरह अपने ही गृह राज्य में इतनी शानदार घुमक्क्ड़ी कभी नहीं की थी।  इसके लिए विशेष धन्यवाद के पात्र संजय कुमार सिंह जी है।  हम लोगो को दोनों ओर (पनारी-गुप्तेश्वर धाम-पनारी ) से आने-जाने में कुल समय 12 घंटे लगे।  हालाँकि संजय जी हमेशा इससे दोगुने समय में गए , मगर इस बार तेज चलने वालों के साथ फंस गए थे।  इस यात्रा में सबसे ज्यादा हालत हम दोनों की ही ख़राब थी , क्योंकि चलने की आदत ख़त्म जो  हो  गयी है ।  
गुप्तेश्वर धाम कब जाया जा सकता है -  सिर्फ साल में दो बार महाशिवरात्रि (फ़रवरी में ) के समय और सावन                                      (जुलाई-अगस्त )के पूरे  महीने में ही जाया जा सकता है।  बाकि समय यात्रा बंद रहती है।  
कैसे जाये -  
                 वायु मार्ग - नजदीकी हवाई अड्डे पटना और वाराणसी है।  
               रेल मार्ग -सासाराम मुगलसराय -गया रेल लाइन में एक जंक्शन है।  जहाँ से दिल्ली - हावड़ा रूट की                  गाड़िया गुजरती है।  
             सड़क मार्ग - सासाराम राष्ट्रिय राजमार्ग क्रमांक 2 ( जीटी रोड ) पर स्थित है।  सासाराम से आप टेम्पो ,                   शेयरिंग टैक्सी करके 40 किमी  दूर पनारी तक जा सकते है।  वहां से पैदल ट्रैक करके जान पड़ेगा।  
क्यों जाये ? -  यदि  आपको धार्मिक, प्राकृतिक , साहसिक यात्राओं में थोड़ी भी रूचि है , तो आपको गुप्तेश्वर                          धाम अवश्य जाना चाहिए।  
शीतलकुण्ड जल प्रपात का आनंद 

गुफा का प्रवेश द्वार 

जलप्रपात का एक मनमोहक नजारा 
दूर से दीखता जल प्रपात 

बाबा के भक्त बोल बम के नारे के साथ 
गुफा के अंदर का दृश्य 

गुफा के अंदर 

बाबा गुप्तेश्वर नाथ का प्राकृतिक शिवलिंग 




पार्किंग का एक दृश्य
आपातकालीन व्यवस्था के तहत ऑक्सीजन सिलिंडर भी रखे थे।  

गुफा में प्रवेश करने के पहले 
वापिसी भी आसान न थी 

बाबा का आशीर्वाद और ऐसे दृश्यों के लिए जो कष्ट सही वो कम थे। 
 कुछ फोटोग्राफ हमारे मित्र अभ्यानंद सिन्हा जी ने अपने मित्र वीरेंद्र कुमार जी से लेकर इस पोस्ट के लिए दिए ,  उनका हार्दिक धन्यवाद।  बाबा गुप्तेश्वर नाथ सब कृपा करे।

orchha gatha

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एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...