सोमवार, 3 अक्तूबर 2016

महाभारत कालीन माँ तारा चंडी मंदिर, सासाराम ( गुप्तेश्वर धाम यात्रा भाग-2)


शेरशाह के मकबरे के बाद हम लोग अपने मोबाइल के जीपीएस के भरोसे माँ ताराचंडी मंदिर की और निकल पड़े । धूप बहुत तेज हो चुकी थी । जीपीएस महोदय की सुचना के अनुसार चलते चलते जब हमने एक पहाड़ी पर मंदिर नुमा संरचना देखकर गाड़ी मोडी तो कुछ शंका हुई । तो रस्ते में मिले एक ऑटो वाले को रोककर पूछा , उसने बताया कि ये तो शहीद स्मारक है । इससे ज्यादा उसे भी कोई जानकारी नही थी । तो हम लोग पुनः मुख्य सड़क पर आ गए । मकबरे से लगभग 5 किमी चलने के बाद हम लोग माँ ताराचंडी के मंदिर पहुंचे । मंदिर के बारे में मुख्य जानकारी यह है , कि
सासाराम शहर से दक्षिण में कैमूर की पहाड़ी की मनोरम वादियों में मां ताराचंडी का वास है। ताराचंडी के बारे में स्थानीय लोगों का मानना है कि ये 51शक्तिपीठों में से एक है। कहा जाता है कि सती के तीन नेत्रों में से भगवान विष्णु के चक्र से खंडित होकर दायां नेत्र यहीं पर गिरा था। तब यह तारा शक्ति पीठ के नाम से चर्चित हुआ। कहा जाता है कि महर्षि विश्वामित्र ने इसे तारा नाम दिया था। दरअसल, यहीं पर परशुराम ने सहस्त्रबाहु को पराजित कर मां तारा की उपासना की थी। मां तारा इस शक्तिपीठ में बालिका के रूप में प्रकट हुई थीं और यहीं पर चंड का वध कर चंडी कहलाई थीं। यही स्थान बाद में सासाराम के नाम से जाना जाने लगा।
मां की सुंदर मूर्ति एक गुफा के अंदर विशाल काले पत्थर से लगी हुई है। मुख्य मूर्ति के बगल में बाल गणेश की एक प्रतिमा भी है। कहते हैं कि मां ताराचंडी के भक्तों पर जल्दी कृपा करती हैं। वे पूजा करने वालों पर शीघ्र प्रसन्न होती हैं। मां के दरबार में आने वाले श्रद्धालु नारियल फोड़ते हैं और माता को चुनरी चढ़ाते हैं।

चैत और शरद नवरात्र के समय ताराचंडी में विशाल मेला लगता है। इस मेले की प्रशासनिक स्तर पर तैयारी की जाती है। रोहतास जिला और आसपास के क्षेत्रों में माता के प्रति लोगों में अगाध श्रद्धा है। कहा जाता है गौतम बुद्ध बोध गया से सारनाथ जाते समय यहां रूके थे। वहीं सिखों ने नौंवे गुरु तेगबहादुर जी भी यहां आकर रुके थे।

कभी ताराचंडी का मंदिर जंगलों के बीच हुआ करता था। पर अब जीटी रोड का नया बाइपास रोड मां के मंदिर के बिल्कुल बगल से गुजरता है। यहां पहाड़ों को काटकर सड़क बनाई गई है। ताराचंडी मंदिर का परिसर अब काफी खूबसूरत बन चुका है। श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए बेहतर इंतजाम किए गए हैं। मंदिर परिसर में कई दुकानें भी हैं। अब मंदिर के पास तो विवाह स्थल भी बन गए हैं। आसपास के गांवों के लोग मंदिर के पास विवाह के आयोजन के लिए भी आते हैं।

मां ताराचंडी का मंदिर सुबह 4 बजे से संध्या के 9 बजे तक खुला रहता है। संध्या आरती शाम को 6.30 बजे होती है, जिसमें शामिल होने के लिए श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। मंदिर की व्यवस्था बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद देखता है।
कैसे पहुंचे- ताराचंडी मंदिर की दूरी सासाराम रेलवे स्टेशन से 6 किलोमीटर है। मंदिर तक पहुंचने के लिए तीन रास्ते हैं। बौलिया रोड होकर शहर के बीच से जा सकते हैं। एसपी जैन कालेज वाली सड़क से या फिर शेरशाह के मकबरे के बगल से करपूरवा गांव होते हुए पहुंच सकते हैं। आपके पास अपना वाहन नहीं है तो सासाराम से डेहरी जाने वाली बस लें और उसमें मां ताराचंडी के बस स्टाप पर उतर जाएं।
मंदिर बहुत भव्य बना हुआ है , और अभी भी निर्माण कार्य चल रहा है । मंदिर में संगमरमर की शिलाओं पर दानदाताओं के नाम जगह जगह खुदे हुए है । तारा चंडी मंदिर प्रांगण में ही भैरव नाथ का नया मन्दिर बना है । एक नयी और रोचक बात मुझे ये दिखाई दी , कि मंदिर प्रांगण में ही एक मजार भी बनी हुए । इसके बारे में जब पुजारी जी से पूछा तो उन्होंने बताया कि पहले माँ ताराचंडी का मंदिर कम जगह में बना हुआ था । लेकिन जब मंदिर का विस्तार हुआ तो पास ही बनी ये मजार मंदिर परिसर के बीचोबीच आ गयी । लेकिन धार्मिक सद्भाव न बिगड़े इसलिए इसे कोई क्षति नही पहुचाई गयी । आज भी मुस्लिम धर्मं के लोग यहां उपासना करते है । देश में धार्मिक सद्भाव की अनूठी मिसाल देखने मिली । खैर दर्शन करने के बाद कुछ देर हम लोगों ने मंदिर परिसर में नीचे लेटकर आराम किया । संजय सिंह जी को रात को आना था , इसलिए हमारे पास पर्याप्त समय बचा था । मुंडेश्वरी देवी के बारे में पता करने पर मालूम हुआ , वहां जाने के लिये देर हो चुकी । अगर इस वक़्त (लगभग शाम के 5 बजे ) चले तो वहां पहुचते ही रात हो जायेगी । जबकि हमारी मंजिल तो बाबा गुप्तेश्वर नाथ धाम है । अब बचे समय में क्या किया जाये , यही सोचते हुए हम लोग मंदिर से बहार की और निकले तो देखा पास ही में एक दीवार पर परशुराम द्वारा पूजित शिव मंदिर सोनगढ़वा की जानकारी अंकित थी । मंदिर यहाँ से नजदीक ही था । फिर क्या था , चल पड़े NH-2 बाईपास से कुछ ही दुरी पर स्थित सोनगढ़वा शिव मंदिर । मंदिर बिलकुल राष्ट्रिय राजमार्ग 2 (जीटी रोड) के किनारे ही था । यहाँ न के बराबर लोग थे । मंदिर में बड़ी शांति थी । मंदिर के आसपास पड़े प्राचीन पत्थर  मंदिर की प्राचीनता को प्रमाणित कर रहे थे । हाथ-मुंह धोकर हमने मंदिर में प्राचीन शिवलिंग के दर्शन किये । कुछ देर मंदिर के पुजारी जी के पास बैठे । उनहोंने बताया कि मंदिर महाभारत कालीन है । पुराने समय में मंदिर के आसपास ही शहर बसा हुआ था । शेरशाह के समय वर्तमान जगह पर शहर फिर से बसाया गया । आज भी मंदिर के आसपास की जगहों पर खुदाई करने पर सोने के सिक्के या मुहरे मिलती है । इसलिए इस जगह को सोनगढ़वा कहा जाता है । कुछ देर आराम करने के बाद ड्राईवर ने वही के नल से कार धोई । सूर्य अस्त होने के पहले ही हम वापिस सासाराम की तरफ निकल लिए । सासाराम पहुँचते ही मोनू को भूख लग आई थी । तो स्टेशन के सामने एक जगह सबने चौमिन खाया । मोनू ने बताया कि पापा के एक सहकर्मी अखिलेश सिंह जी हाल ही में सोनपुर रेलवे के माइक्रो वेब में पदस्थ हुए है । तो संजय जी का इंतजार करते हुए उनसे भी मिल लिया जाये । तो मोनू ने मोबाइल से उन्हें कॉल किया । तो उन्होंने हमें रेलवे स्टेशन ही बुला लिया । खैर हम स्टेशन के नजदीक ही थे । तो पहुँच गए । फिर उनके साथ ही हमने मारवाड़ी भोजनालय में खाया । उनसे भी जब गुप्तेश्वर धाम चलने की बात बताई तो वो भी चलनेचलने तैयार हो गए । अखिलेश जी भी कई बार बाबा धाम (बैद्यनाथ धाम, झारखण्ड) कांवर लेकर जा चुके है । इसलिए पैदल चलना उनके लिए कोई समस्या नही थी । गुप्ता बाबा के लिए हम सब ने वही बाजार से बोल बम के कपडे (गेरुआ बस्त्र) और टोर्च खरीदी । अब बस इंतज़ार था , तो संजय सिंह जी का ! दिनभर घूमने से शरीर में थकावट तो हो चुकी थी, जो खाना खाने के बाद और मेहसूस हो रही थी । माइक्रो वेब के ऑफिस में जब ऎसी रूम में आये तो वही फर्श पर ही लेट गए । पता ही नही चला कब नींद आ गयी । बाहर बारिश बहुत जोरो की होने लगी ..

तारा चंडी मन्दिर के पीछे NH 2




माँ तारा चंडी का प्रवेश द्वार

मूख्य द्वार

मंदिर और मजार एक साथ 


सोनवागढ़ महादेव मंदिर 

अगले भाग में पढ़िए कैसे हम लोग नक्सली क्षेत्र में बम बने और कैसे बाबा गुप्तेश्वर नाथ के दुर्लभ और दुर्गम दर्शन हो पाये !

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छा लगा पढकर कि हमारे आसपास बहुत सी छुपा हुआ स्थल है जो एतिहासिक सार गर्भित है ।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आभार । ये तो कुछ भी नही अगली पोस्ट में आपको असली खजाना मिलेगा ।

      हटाएं
    2. आभार । ये तो कुछ भी नही अगली पोस्ट में आपको असली खजाना मिलेगा ।

      हटाएं
  2. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति कादम्बिनी गांगुली और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

    उत्तर देंहटाएं
  3. पांडे जी ऐसी जगह जाकर मन आनंदित हो जाता है, बहुत अच्छा लगा इस यात्रा को पढकर।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बढ़िया, नक्सली क्षेत्र में प्रवेश की इन्तज़ारी है। :)

    उत्तर देंहटाएं
  5. एतिहासिक जगह बढ़िया जानकारी दी आपने हमे तो पता ही नहीं इस मंदिर के बारे में

    उत्तर देंहटाएं
  6. दूसरा भाग पढ़ लिया, अपने देश में न जान ऐसे कितने जगह होंगे जो गुमनामी में खोये हुए है, लोग वहीं जाते है जहाँ के बारे में जानते है, नयी जगहों पर जाना कोई पसंद नहीं करता

    उत्तर देंहटाएं
  7. ऐतिहासिक जगह का बेहतरीन वृतांत लिखा है पांडेय जी आपने !!

    उत्तर देंहटाएं

ab apki baari hai, kuchh kahne ki ...

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...