मंगलवार, 1 नवंबर 2011

सब कुछ नया नया ............सब कुछ अलग

दोस्तों कई बार ऐसा होता है, कि आपके जीवन में अचानक कोई आता है और आपका जीवन बदल जाता है। इसी तरह से कुछ मेरे जीवन में भी कुछ इसी तरह से हो रहा है। हर सुबह का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार रहता है ............ जिन्दगी में कुछ नयी उमंगें.................सपने..................अपने .......................घर ................घास...........पलास..........आस-पास .............हरियाली..........दिवाली .........................सब कुछ अच्छा लगने लगा है ।
वर्ष २०११ में बहुत सी सफलताएं मिली है।

मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

दिवाली : एक पर्व और उद्देश्य



दिवाली पर्व के बारे में अनेक कथाएँ और किंवदंतियाँ प्रचलित है। वैसे तो यह त्यौहार धन और प्रकश से जुदा है । मगर इस त्यौहार पर साफ़-सफाई और स्वच्छता की परंपरा भी जुडी है । हमारे ग्रंथो में कहा गया है - तमसो माँ ज्योतिरगमय अर्थात हे माँ ! मुझे अन्धकार से प्रकाश की और ले चलो । इसी उद्देश्य की सार्थकता को प्रतिबिंबित करता है ये त्यौहार । मगर आज हम बाजारवाद और आधुनिकता के अन्धानुकरण के कारन इस त्यौहार के मूल उद्देश्यों को भूल कर केवल आडम्बरो और कर्मकांडो के पीछे भाग रहे है ।



हम बाहरी चमक दमक को बढ़ने में तो खूब लगे है , मगर कभी खुद के भीतर झांक कर देखा है कि कितनी गंदगी है ?



हमने घरो के बाहर रोशनियों से जगमग कर दिया है , मगर कभी अपने भीतर के अँधेरे को दूर कर पाए है ?



हम धन कि आस में लक्ष्मी को पूजते है , मगर कभी धन का सही अर्थ समझ पाए है ?



दुसरो को मिठाईयां तो खूब बांटते है , मगर उनसे कितनी बार मीठे बोल बोले है ?






दीपावली को भगवन राम से भी जोड़ कर देखा जाता है । कहते है कि, भगवान राम रावन को मार कर इसी दिन अयोध्या वापिस लौटे और इस ख़ुशी में अयोध्या वासियों ने दीप मालाये सजाकर उनका आमवस्या कीअँधेरी रात में स्वागत किया तभी से दीप जलने की परंपरा चल पड़ी । एक कथा ये भी है ,किइसी दिन देव- असुर द्वारा किये गये समुद्र-मंथन के दौरान कार्तिक आमवस्या के दिन ही समुद्र से लक्ष्मी अवतरित हुई थी । इसीलिए इस दिन लक्ष्मी कि पूजा कि जाती है।



प्राचीन काल में हिन्दुओ के चार प्रमुख त्योहारों को चार वर्णों के आधार पर विभाजित किया गया था। ब्राम्हणों के लिए रक्षाबंधन, क्षत्रियो के लिए दशहरा, वैश्यों के लिए दीपावली और शूद्रो के लिए होली । इस तरह से दीपावली का ये पर्व वैश्यों के लिए अति महत्वपूर्ण होता है , सभी वैश्य इस दिन अपने पुराने बही खातो को बंद कर नए बही खातो का पूजन कर व्यापार की पुनः शुरुआत करते है ।



हिन्दू धर्म में सदैव ही प्रकाश को महत्वपूर्ण मन गया है , प्रत्येक शुभ अवसर की शुरुआत दीप जलाकर की जाती है । अग्नि को देवता का दर्ज़ा दिया गया है । भगवान बुद्ध ने जो अपना अंतिम उपदेश दिया था - अप्प दीपो भाव अर्थात अपना दीपक स्वयं बनो । बुद्ध की इस बात के निहातार्थ बहुत थे , जैसे जीवन के अन्धकार से लड़ने के लिए हमें स्वयं ही दीवाक बनना होगा,तभी जीवन के सरे अन्धकार दूर हो पाएंगे ........






अबकी दिवाली ऐसी मनाना



दियो में ही नही, दिल में भी ज्योत जलाना



दूर हो मन का अँधेरा, ऐसा हो प्रकाश



बस घरो में ही नही , जीवन में उजास



दीपमालाओं सा, प्रकाशित हो जीवन



दूर हो अँधेरा , उज्जवल हो मन



दूजो के जीवन में खुशियाँ लाना



अबकी दिवाली ऐसी मनाना



खुशियों से उन्हें भर दो, जो दिल है खली



रोशन हो उनको घर भी, जिनकी सूनी थाली



सबके घर हो रोशन , ऐसी हो दिवाली



दियो में ही नही , दिल में भी ज्योत जलाना



अबकी दिवाली ऐसी मनाना


शनिवार, 22 अक्तूबर 2011

दिल्ली : नाम बड़े और दर्शन छोटे ...!!

ये है दिल्ली नगरिया ...










आभाव का प्रभाव !!









मज़बूरी लेकिन जरुरी ...









स्वागतम दिल्ली !!!

नमस्कार मित्रो ,
पिछले ५-६ दिनों से दिल्ली प्रवास पर हूँ । इसके पहले सिर्फ एक बार ही कुछ घंटो के लिए ही दिल्ली आया था । इसलिए दिल्ली की वही तस्वीर मन में बसी थी , जो टी ० वी ० और फिल्मो में ही देखी थी । जब पहली बार आया था , तो निजामुद्दीन स्टेशन से मुखर्जी नगर तक ही गया था । रस्ते में राजघाट आदि होते हुए ही सुन्दर दिल्ली ही दिखी थी । मगर इन ५-६ दिनों में दिल्ल्ली की दूसरी ही तस्वीर दिखी है .....
चमचमाती इमारतों के पीछे बिलबिलाते झुग्गियो के लोग ............... सड़ांध मारते अतिक्रमित नाले -नालियां ......... दिन भर की भाग दौड़ के बाद रात भर पानी आने का इंतजार करते लोग ............. दिल्ली जल बोर्ड के टेंकरों के सामने पानी के लिए लड़ते झगड़ते लोग .................मेट्रो का सुख तो है , मगर रिक्शोवालो के सूखते कंठ भी है..........
वाह री ....... दिल्ल्ली

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

खींचो अब प्रत्यंचा .....



जब-जब घायल हुआ, धर्म का सांचा
तब-तब थामी किसी ने प्रत्यंचा
जब रावण का बढ़ रहा था अत्याचार
तब धर्म होने लगा बेबस और लाचार
ज्यो ही सीता का हुआ अपहरण, कराही प्रकृति
तब हुंकार भरी राम ने , झूम उठी धरती
धूमिल हुआ दशानन, कोई अधर्मी न बचा
अधर्म के विरुद्ध, जब राम ने खींची प्रत्यंचा
द्वापर में कौरवों ने पांडवों पर कहर ढहाया
सत्य- धर्म पांडवों का , दुर्योधन को न भाया
यूं ही बढती गयी, नित अधर्म की पराकाष्ठा
पर डिग न पाई , पांडवो की धर्म में आस्था
कुरुक्षेत्र के रण में , कृष्ण ने महाभारत रचा
सुन गीता का उपदेश, अर्जुन ने खींची प्रत्यंचा
आज भी अधर्ममय हो गया है सकल राष्ट्र
हर ओर रावण, कंस , दुर्योधन और ध्रतराष्ट्र
नित बढ़ता जा रहा है, अधर्म का अत्याचार
क्यों चुप हैं हम, आओ मिलकर करें विचार
कब तक करेंगे राम-कृष्ण, अर्जुन की प्रतीक्षा
जागो,उठो और खींचो अब ........प्रत्यंचा

बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

मैं और जिन्दगी ........!!!!!!!


















जिन्दगी ने मुझसे कहा- तू चाहता क्या है ?






मैंने कहा- तू ही मेरी चाहत , तुझसे दिल लगाना चाहता हूँ






तू औरो को आजमाती है, मैं तुझे आज़माना चाहता हूँ






जिन्दगी- इतनी आसान नही मैं, जितना तुम समझ बैठे






मेरी चाहत में न जाने कितने , मौत को गले लगा बैठे






मैं- गर तू आसन होती , तो मेरी चाहत न होती






मौत तो मिलेगी ही, उससे कहाँ राहत होती ?






मौत तो मंजिल है , मगर सफ़र तो तू है






दिल्लगी न समझना , ये इश्क की खुशबू है






जिन्दगी- मेरे सफ़र में, सब इश्क जाओगे भूल






कोई खुशबु नही यहाँ , न ही कोई है फूल






मैं- होगा ये तुम्हारा नजरिया ,पर तुम बहुत खूबसूरत हो






लाख समझाओ मुझे, पर तुम मेरी जरुरत हो






जिन्दगी- मैं असीम हूँ, जैसे कोई सागर






मिल भी गयी , तो करोगे क्या मुझे पाकर






मैं-तुम्हारे सहारे, बहुत से नज़रिए बदलने है






बहुतो की जिन्दगी में , "चन्दन " के फूल खिलने है !

सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

चिर ऋणी रहूँगा गुरुवर का ....











परम पूज्य स्वामी श्री सुकान्तानंद जी के श्री चरणों में सादर समर्पित !


जब चारो तरफ था अँधेरा, माँ थी मुझसे दूर

जिन्दगी उलझनों से घिरी, मैं था मजबूर

राह कोई सूझी नही, प्यास मेरी बुझी नही

जीवन में थी एक कमी, और आँखों में थी नमी

किस डगर पर चालू , कैसे जीवन में संभालू

मन में थे कई विचार , पर मैं न था तैयार

तब किसी ने हाथ थमा , जिन्दगी को दिया अमलीजामा

अब तक था मैं गुमराह , फिर मिली मुझे सही राह

दूर हटी परेशानियों की छाया , जीवन में उजाला आया

भटकते- भटकते पहुंचा जहाँ , अहसान है उस दर का

आगे अब शब्द नही, चिर ऋणी रहूँगा गुरुवर का


आपका चरण सेवक

मुकेश पाण्डेय "चन्दन "

मंगलवार, 4 अक्तूबर 2011

बूँद











कौन कहता है ,कि बूँद छोटी होती है

वो अपने अन्दर सागर समेटे होती है


जीवन की शुरुआत बूँद से ही होती है


बूँद के बिना कहाँ आँख रोती है ?


बूँद से बादल, बादल से वर्षा होती है


वर्षा की बूँद, बीजों में जीवन बोती है


करते श्रम तो पसीने की बून्द निकलती है


बूँद जीवन का सत्य लेकर मचलती है


छोटी होकर बड़ा होना , बूँद सिखलाती है



संगठन ही जीवन है, ये बूँद दिखलाती है





- मुकेश पाण्डेय 'चन्दन'

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

‎32 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वाला गरीब नहीं:

‎32 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वाला गरीब नहीं:

योजना आयोग आजतक ब्यूरो नई दिल्ली, 21 सितम्बर 2011 क्या दिल्ली में सिर्फ 32 रुपये रोजाना की कमाई पर कोई गुजर-बसर कर सकता है?

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को दाखिल हलफनामे में योजना आयोग ने गरीबी रेखा की जो नई परिभाषा तय की है, उसमें कहा गया है कि दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर या चेन्नई में अगर चार लोगों का परिवार महीने में 3860 रुपये से ज्यादा खर्च करता है तो उसे गरीब नहीं माना जाएगा.
...
चार लोगों पर 3860 रुपये का मतलब है एक आदमी पर 32 रुपये प्रतिदिन. इसी तरह योजना आयोग के मुताबिक अगर ग्रामीण क्षेत्रों में कोई शख्स हर रोज 26 रुपये से ज्यादा खर्च करता है तो वो गरीब नहीं कहलाएगा. उसे गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों के लिए चलने वाली सरकारी योजना का लाभ नहीं मिलेगा.

सब्जी की कीमतों में आग लगी है. दूध के दाम लगातार बढ़ रहे हैं. खाने पीने की चीजों के भाव आसमान छू रहे हैं. महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है. लेकिन योजना आयोग की दलील है कि जो हर रोज 32 रुपए खर्च कर सकता है वो गरीब नहीं कहा जाएगा.

चलिए जानते हैं कि योजना आय़ोग ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दायर किया है उसमें गरीबी की परिभाषा क्या दी गई हैः

1. शहरों में जो 965 रुपए प्रति माह खर्च करते हैं. यानी शहरों में जो 32 रुपए प्रति दिन खर्च करते हैं वो गरीब नहीं है.

2. गांवों में जो 781 रुपए प्रति माह खर्च करते हैं. यानी गांवों में जो 26 रु प्रति दिन खर्च करते हैं वो गरीब नहीं हैं.

3. मेट्रो में रहने वाला 4 लोगों का परिवार अगर प्रति माह 3860 खर्च करता है. वो गरीब नहीं हैं.

योजना आयोग ने गरीब और गरीबी की परिभाषा बदल दी.

अब इस बदली हुई परिभाषा के अनुसार शहरों में 32 और गांवों में 26 रुपए खर्च करने वाले लोग कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा सकते. तेंदुलकर कमेटी का हवाला देते हुए योजना आयोग ने कहा कि आप गरीब नहीं है

अगर चावल या गेहूं पर हर रोज 5 रु खर्च करते हैं.

अब देखिए 5 रुपये में आपको मिलेगा क्या. दिल्ली में चावल औसतन 22 रुपए किलो है और गेहूं औसतन 12 रु किलो. तो 5 रुपए में मिलेगा 136 ग्राम चावल (3 रु का) और 166 ग्राम गेहूं (2 रुपए). योजना आयोग कहता है आप गरीब नहीं हैं.

अगर हर रोज 1.80 रु सब्जियों पर खर्च करते हैं. अब देखिए 1.80 रुपए में मिलेगा क्या 180 ग्राम आलू या 90 ग्राम प्याज या 90 ग्राम टमाटर या 180 ग्रा लौकी. योजना आयोग कहता है कि आप गरीब नहीं हैं.

अगर हर रोज दाल पर 1 रुपये खर्च कर सकते हैं. अब जरा देखिए 1 रुपये में कितनी दाल मिलेगी. दिल्ली में दाल की औसत दर 50 रु प्रति किलो है. यानी 1 रुपये में सिर्फ 20 ग्राम दाल मिलेगी. योजना आयोग कहता हैं. आप गरीब नहीं हैं

अगर दूध पर हर रोज 2.30 रुपये खर्च करते हैं. अब देखिए 2.30 रु में कितना दूध मिलेगा. दूध की कीमत है 34 रुपये प्रति लीटर. लिहाजा 2.30 रुपये में सिर्फ 67 मिली दूध मिल सकता है. योजना आयोग कहता है. आप गरीब नहीं है

अगर एलपीजी पर हर महीने 112 रुपए खर्च करते हैं. अब ब्लैक मार्केट में एलपीजी दरों के मुताबिक 112 रुपए में करीब दो किलो एलपीजी ही मिल सकती है.

योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को आंकड़े तो बता दिया. लेकिन जरा सोचिए क्या इस बढ़ती महंगाई में 32 रुपये प्रतिदिन में कोई अपना गुजारा कर सकता है.

जरा सोचिए क्या महज 3860 रुपये में चार लोगों का परिवार अपनी जिंदगी काट सकता है. आप ये सवाल योजना आयोग को छोड़कर किसी से भी पूछिए जवाब मिलेगा आंकड़ों से जिंदगी नहीं चलती.See More

बुधवार, 14 सितंबर 2011

न चुनर बची न चिंदी : यही तो है आज की हिंदी



आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाये !



आज ब्लोगिंग जगत में बहुत से लोग हिंदी के बारे में लिखेंगे , बहुत से कार्यक्रम होंगे , हिंदी की बेइज्जती और सम्मान भी होगा । और कल फिर हिंदी भुला दी जाएगी । आज हिंदी इस दशा पर आंसू भी नही निकलते !!!!



ब्लोगिंग जगत में मैं समीर लाल 'समीर" (उड़नतश्तरी ) जी का ह्रदय से आजीवन आभारी रहूँगा , क्योंकि अगर वो न होते तो शायद इस ब्लॉग को आप न पढ़ पाते । कनाडा जैसे आंग्लभाषी राष्ट्र में रहकर हिंदी की इतनी सेवा करना समीर जी जैसा कोई बिरला (सीमेंट नही ) ही कर सकता है । सर्वप्रथम समीर जी सारे हिंदी ब्लोगेर्स की और से मैं आपको कोटि कोटि नमन करता हूँ । तत्पश्चात बाकि हिंदी सेवी लोगो को भी मेरा नमन !!!



मेरे मन में आज की हिंदी को लेकर कुछ ख्याल आ रहे है .............






न चुनर बची न चिंदी !



वाह रे ! मेरे देश की राजभाषा हिंदी



अपने ही देश में तू परायी है



हिंदी बोलने में क्यों हमें शर्म आई है



तकनीक में भी अंग्रेजी नही है मज़बूरी



तो भैया , क्यों है हिंदी से दुरी



जिसने हमें पाला पोसा
उसी का हमने तोडा भरोसा



थोड़े पढ़ लिख कर बन गये अंग्रेज



हिंदी टूटी खटिया और विदेशी को सुन्दर सेज



राम भरोसे अपनी भाषा



हिन्दलिश में होती , नयी परिभाषा



अरे कपूतो ! अब तो आँखे खोलो



घर में ही सही , अपनी भाषा तो बोलो



शनिवार, 10 सितंबर 2011

बस सफलता से एक कदम दूर ............


नमस्कार मित्रो ,
एक खुशखबरी है !
हाल ही में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित राज्य सेवा परीक्षा २००९ की मुख्य परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ है । और ख़ुशी की बात ये है , कि इस परीक्षा में आपका ये परिचित इस परीक्षा में सफल हो गया है । और ५ दिसंबर से साक्षात्कार शुरू हो रहे है ..........मतलब मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग में अंतिम चयन में बस एक कदम दूर हूँ । आपकी दुआओं के साथ इस सफलता की उम्मीद में आपका ही ...........

रविवार, 14 अगस्त 2011

एक अनोखा रक्षाबंधन: इतिहास के झरोखे से



सर्वप्रथम आप सभी को प्यार के बंधन के पावन पर्व रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाये !!



मित्रो , हमारे देश के महान नेताओ ने देश की आज़ादी के समय जीवन के हर पक्ष को आज़ादी के एक मौके की तरह से इस्तेमाल किया , चाहे वो त्यौहार ही क्यों न हो !



इसी तरह जब १९०५ में लार्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन प्रस्तावित किया तो , गुरुदेव रवींद्र नाथ टेगौर (तब उन्हें गाँधी जी ने गुरुदेव की उपाधि नही दी थी ) ने रक्षाबंधन पर्व का एक सार्थक प्रयोग किया था। चूँकि अंग्रेजो का बंग भंग करने का मकसद फूट डालो राज करो की नीति के अंतर्गत हिन्दू मुसलमानों में फूट डालना था । लेकिन हमारे महान नेताओ ने उनके मंसूबो पर पानी फेर दिया । जहाँ कृष्ण कुमार मित्र ने स्वदेशी आन्दोलन चलाकर जहाँ अंग्रेजो की नाक में दम कर दिया था , वहीँ रवींद्र नाथ टेगौर ने रक्षा बंधन को अनोखे तरीके से मनाया । पुरे बंगाल में हिन्दुओ ने अपने मुस्लिम भाईयो को राखी बांध कर अंग्रेजो के मुंह पर जोरदार तमाचा मारा । इसी रक्षा बंधन के दौरान ही रवींद्र नाथ टेगौर ने अपना विख्यात गीत आमार सोनार बांगला लिखा था , जो आगे चलकर बंगलादेश का राष्ट्रगान बना । (रवींद्र नाथ टेगौर विश्व के एकमात्र व्यक्ति है जिन्होंने दो राष्ट्रों के राष्ट्रगान की रचना की है ।)



इस तरह एक रक्षाबंधन वो भी था , जब हिन्दू मुसलमान एक हो गये थे । आज के दौर में इसकी प्रासंगिकता और बढ़ गयी है .....



ये बंधन तो ...........प्यार का बंधन ..

सोमवार, 1 अगस्त 2011

भारत रत्न : न जाने कितने जतन

अटल बिहारी वाजपेयी


वर्गीज कुरियन




डॉ एम० एस० स्वामीनाथन





नमस्कार ,








आज देश में सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने की मांग बड़े जोर शोर से उठ रही है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह ने सचिन से पहले हाकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को देने की बात कही है। जबकि मेरा मानना है , कि खिलाडियों को जब उनके खेल में योगदान के लिए पहले से ही राजीव गाँधी खेल रत्न दिया जाता है , तो उन्हें भारत रत्न दिए जाने कि तुक कहाँ तक सही है ? मेरे ख्याल से भारत रत्न सिर्फ उन्ही लोगो को दिया जाना चाहिए जिन्होंने देश के लिए बहुत कुछ किया हो , न कि किसी क्षेत्र विशेष में दिए गये योगदान के आधार पर।




आज भी देश में बहुत से ऐसे लोग है , जिन्होंने देश के लिए सचिन तेंदुलकर से ज्यादा योगदान दिया है। जैसे हरित क्रांति के सूत्रधार डॉ एम्० एस० स्वामीनाथन, श्वेत क्रांति के सूत्रधार डॉ वर्गीज कुरियन तथा ९८ परमाणु परिक्षण के पुरोधा प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी और ऐसे नमो कि सूचि बहुत लम्बी है जिन्होंने देश के लिए सचिन कि तुलना में कहीं ज्यादा योगदान दिया है । मैं सचिन को भारत रत्न दिए जाने का विरोधी नही हू मगर उससे पहले इन लोगो को भी भारत रत्न बनने का हक पहले है।








भारत रत्न जहाँ देश का सर्वोच्च सम्मान है , वही कुछ कमी सी लगती है , जैसे यह सम्मान प्रत्येक वर्ष नही प्रदान किया जाता है । क्या भारत भूमि में रत्नों कि इतनी कमी है , कि हम हर साल एक भारत रत्न नही दे सकते है ?








दूसरी कमी ये महसूस होती है कि इस सम्मान में अभी तक राजनेताओ का ही बोलबाला रहा है , तो क्या देश की सेवा केवल राजनेता ही करते है । नोबल पुरुस्कार कि तर्ज़ पर भारत रत्न को भी मरणोपरांत दिया जाना बंद कर देना चाहिए । क्योंकि लौह पुरुष सरदार पटेल को उनके मरने के पचास साल बाद भारत रत्न दिया जाना किस तरह से उनका सही सम्मान लगता है ।








भारत रत्न के बारे में मेरा एक और सुझाव है कि इसके लिए एक उच्च स्तरीय समिति बनायीं जनि चाहिए जिसमे अलग अलग क्षेत्रो के विशेषज्ञ हो और उनके द्वारा तैयार कि गयी सूचि पर जनता से राय जाननी चाहिए ।

सोमवार, 25 जुलाई 2011

सावन की भूलभुलैया.........



जय हो ,







बहुत सालों बाद आज सावन जमकर बरसा



जाने कब से इसके लिए था मन तरसा



रिम झिम सी फुहारों में



भीगी भीगी सी बहारो में



फिर भीगा सा कोई याद आया



मन में फिर वो सावन समाया



फिर दिल भीग गया उसकी यादो में



खुशबु सावन की बसी उसके वादों में



आज फिर घटाओं ने उसकी याद दिलाई



आज फिर से वही खुमारी छाई



जम के बरसो सावन



आज फिर याद आया साजन !

बुधवार, 29 जून 2011

जून के चर्चित तीन चेहरे: कुछ राज गहरे !!!!







१ मकबूल फ़िदा हुसैन








जून में भारतीय परिद्रश्य में तीन चेहरे चर्चित रहे । तीनो में कई समानताये और अंतर भी है।

१ मकबूल फ़िदा हुसैन


.मन मोहन सिंह
३ बाबा राम देव





तीनो में समानताये :-
तीनो की दाढ़ी है !!
तीनो अपने क्षेत्र में विश्वविख्यात है !!
तीनो दुसरे क्षेत्र में आते ही फिसल गये !!!
तीनो इमानदार है !!!!




शनिवार, 30 अप्रैल 2011

दार्जलिंग के चोर........












































दार्जलिंग
की खूबसूरत वादियों में
प्रकृति की गोद, बादलों की आबादियों में
शुभ्र धवल कंचनजंघा की चोटी
हिमालय के भाल का मोती
देवदार के लम्बे ऊँचे पहरेदार
पुकारते, आओ बारम्बार
खेलो बादलों के खिलोनो से
प्रकृति के अद्भुत नमूनों से
है मौन निमंत्रण , न कोई शोर
दिल चुरा ले गया, दार्जलिंग का




हिमालय की खूबसूरत चोटियों में से एक कंचनजंघा जो दार्जलिंग से बड़ी ही ख़ूबसूरती से दिखाई देती है। सचमुच अद्भुत अनुभव .....बादलो के बीच गुजरना ..............ऊँचे पहाड़ो की सुन्दर सर्पीली राहों से चाय के बागानों को निहारना .........
जरा सोचिये आप अपने होटल के कमरे में खिड़की खोले बैठे हो और ....
तभी कोई बादल चोरो की तरह आपके कमरे में आये और तब....
आपकी ख़ुशी की सीमा न रहेगी .... ये बादल आपका सचमुच दिल चुरा ले जायेगा ......
सुबह सुबह जब आप टाईगर हिल से जब सूर्योदय होते देखेंगे तो सब भूल जायेंगे .............बादलो के ऊपर टाईगर हिल से आप जब सूर्योदय के समय जब दूर हिमाच्छादित कंचनजंघा पर नजर डालेंगे तो ....मनो स्वर्ग का अनुभव होगा ..... तब ऐसा लगेगा की इस नज़ारे को हमेशा के लिए आँखों में कैद कर लें .

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

क्रिकेट किरकिट और एम् एम् एस

नमस्कार दोस्तों ,
इस बार पुरे देश में किरकिट और क्रिकेट की बयार चल रही है । क्रिकेट तो आप सभी को समझ में आया होगा लेकिन आप जरुर ये सोच रहे होंगे की ये किरकिट क्या है ?! अब भाई , बात ये है कि पिछला साल पूरी तरह घोटालो को समर्पित रहा और उसका असर इस साल पर भी पड़ रहा है। और पिछले साल के घोटालेबाज लोगो कि किरकिट ( बे-इज्ज़ती ) इस साल हो रही है ।
अब खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे वाली कहावत हो रही है। कैसे ।! अब योग वाले बाबा रामदेव ने काला धन का मुद्दा सरे देश के सामने जोर शोर से उठाया , उसमे लिप्त लोगो कि आफत हो गयी । हमारे एम्० एम० एस० साहब यानि मन मोहन सिंह जी भी परेशानी में आ गये है । हमारे ईमान दार प्रधानमंत्री जी कहते है कि , उनके मंत्रियो के घोटालो में उनका कोई योगदान नही है !!!!!!! मतलब जहाज का कप्तान कहे कि जहाज पर कोई कर्मचारी गलती करे तो कप्तान कि कोई जवाबदारी नहीं !!!!
भाई , देश में हो रही इस किरकिट का मजा लेने का नही बल्कि सजा देने का समय आ गया है ......
आपका की कहना है जनाब ?जागो भारत जागो

सोमवार, 31 जनवरी 2011

हो सकती है .. देश में फिर से एक क्रांति ?!!!

दोस्तों ,
बापू की पुण्यतिथि पर देश में बहुत समय के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ देश लाम बंद हुआ है । दिल्ली में किरण बेदी , अरविन्द केजरीवाल , स्वामी अग्निवेश और भ्रटाचार से पीड़ित असंख्य लोग... ...... जयपुर में अरुणा राय ...बिलासपुर में बाबा रामदेव .........और देश में कई जगह न जाने कितने लोग .................... एक आशा और आक्रोश के साथ .......
टेलीविजन पर जब इन आक्रोशित लोगो को देखा तो यह आन्दोलन कुछ अलग सा था ........?
इसमें स्वार्थी नेता नहीं थे !
इसमें राजनीति नहीं थी !!
इसमें कई अच्छे लोग शामिल थे !
इसमें आम आदमी अपने आम मुद्दे पर एकजुट हुए थे !
अब इन सब को देख कर जेहन में इतिहास में पढ़ी हुई कई क्रांतियाँ याद आ गयी ......... १७७६ में अमेरिका में लोगो ने अंग्रेजो के खिलाफ इसी तरह आवाज उठाई .... और दुनिया के पहले लिखित संविधान के साथ एक लोकतंत्र का जन्म हुआ ............. १७८९ में फ़्रांस में पेरिस में इसी तरह लोगो की भीड़ ने एक क्रांति को जन्म दिया ...... दुनिया को स्वतंत्रता , बंधुता, और समानता का नारा मिला । ....... भारत में लोग इसी तरह ..........गाँधी जी के पीछे अहिंसा के दम पर दुनिया की तब सबसे बड़ी ताकत से लड़ने चल पड़े ........ ........ .......
आज फिर से लोग परेशां है ........... महंगाई .......भ्रष्टाचार .........घोटाले ......आतंकवाद.........नक्सलवाद.... और न जाने क्या क्या ............
लोग क्रांतियाँ तब नही करते जब उन पर अत्याचार हो , जब उन्हें उनके अधिकार न मिले .... जब उनकी कही सुनवाई न हो ...!!!!
लोग क्रांतियाँ तब करते है जब इन सब का ज्ञान हो , अपने अधिकारों की जानकारी हो ..............
अब वक़्त आ गया है ........
बहुत हो गया ......
हम भारत के लोग ......
हमारा संविधान हमारे लिए है ....उनके लिए नही जो हमारा पैसा स्विस बेंको में जमा करते है।
हमारी जनता अब जाग रही है .....

बुधवार, 12 जनवरी 2011

स्वामी विवेकानंद कुछ जाने कुछ अनजानेसे .... युवादिवस की शुभ कामनाएं . फिर हाजिर हूँ ..... एक नए जोश धमाके के साथ !!

नमस्कार मित्रो,
सभी ब्लोगर्स भाई-बहनों , माताओ, चाचाओ, चाचियों , मामियों , मामाओं आदि सभी पढने वालो को देर से ही सही नव वर्ष की शुभकामनाये । इतने दिन तक गायब रहने के लिए क्षमा चाहता हूँ। वजह सिर्फ इतनी सी है की पिछले दिनों मैं मध्य प्रदेश राज्य लोक सेवा आयोग की मुख्य परीक्षा में व्यस्त रहा ।
मित्रो आज स्वामी विवेकानंद जी की जन्म तिथि को सारे देश में युवा दिवस के रूप में मनाया जा रहा हूँ तो सोचा क्यूँ न उनके जीवन के कुछ जाने अनजाने पहलूओ की चर्चा की जाये ........
स्वामी जी को आज हम विवेकानंद के नाम से जानते है , लेकिन सन्यासी होने के बाद स्वामी जी ने अपने बचपन के नाम नरेन्द्र नाथ दत्त को त्यागकर अपना नाम स्वामी विविदिशानंद रखा था । लेकिन जब विश्व धर्म संसद में भाग लेने के पहले जब खेतड़ी महराज ने स्वाजी से कहा की - स्वामीजी आपका यह नाम थोडा कठिन है , अतः आप कोई सरल सा नाम रखे तो लोगो को आसानी होगी । स्वामीजी ने खेतड़ी महराज की बात मानकर अपना नाम विवेक आनंद अर्थात विवेकानंद कर लिया । और ११ सितम्बर १८९३ को शिकागो में साडी दुनिया ने भारत के इस सन्यासी को सनातन धर्म की श्रेष्ठता पर दहाड़ते सुना ।
स्वामी जी चाहते थे कि युवा पहले स्वयं का विकास करे , तभी तो वो देश का विकास कर सकेंगे । स्वामीजी भारत को अनंत संभावनाओं वाला एक सर्वश्रेष्ठ देश मानते थे । उनका मानना था कि भारतीय युवा ही देश को स्वतंत्र कर सकते है । परन्तु स्वामीजी आत्मविकास पर भी बल देते थे।
एक बार स्वामी जी बनारस में बाबा विश्वनाथ के दर्शन से लौट रहे थे , उनके हाथो में प्रसाद कि थैली थी जिसे देख कुछ बन्दर उनकी और लपके .... स्वाजी ने दौड़ लगा दी ..बन्दर भी उनके पीछे भागे ...तभी एक दुकान वाले ने आवाज़ लगी "भागो मत सामना करो " स्वाजी जी रुके ..रुक कर पीछे देखा तो बन्दर उलटे पांव भाग गये । स्वाजी जी ने इस बात को गाँठ बाँध लिया । और अपने जीवन में कभी परेशानियों से भागे नहीं बल्कि उनका रुक कर सामना किया और विजय हासिल की ।
स्वामी जी के जीवन के बहुत सारे किस्से है जिन्हें हम अपने जीवन में उतार सकते है ........
एक बार स्वामी जी कलकत्ता में ठहरे हुए थे , वे रोज सुवह नित्य कि भांति प्रातः भ्रमण पर जाते थे , उसी रस्ते से गवर्नर जनरल भी मोर्निंग वाक को जाता था । गवर्नर जनरल ने स्वामी जी के बारे सुना था , इसलिए वो स्वामी जी कि परीक्षा लेना चाहता था। एक दिन उसने रस्ते कि एक दीवार पर लिखा ' वेयर इज गोड' स्वामी जी ने वेयर कि स्पेलिंग में से डव्लू हटा दिया । अब दीवार पर लिखा था ' हीयर इज गोड "

orchha gatha

बेतवा की जुबानी : ओरछा की कहानी (भाग-1)

एक रात को मैं मध्य प्रदेश की गंगा कही जाने वाली पावन नदी बेतवा के तट पर ग्रेनाइट की चट्टानों पर बैठा हुआ. बेतवा की लहरों के एक तरफ महान ब...