गुरुवार, 22 जून 2017

दिलवालों की दिल्ली के दर्शन (भाग -1 )


नमस्कार मित्रों ,
पिछले साल दिवाली के समय ओरछा में अकेला ही था , श्रीमती जी मायके गयी हुई थी।  तो अब दीपावली जैसा महापर्व अकेले कैसे मनाया जाये।  घर ( बक्सर, बिहार ) जाने के लिए काम से काम एक हफ्ते की छुट्टी चाहिए।  इसलिए इस बार दिवाली के शुभ अवसर पर दिल्ली में अपनी इकलौती बहन निक्की के यहाँ जाने का ख्याल मन में आया।  इस ख्याल में दिल्ली में रहने वाले घुमक्कड़ दोस्तों से मिलने का लालच भी था।  ये सामान्य दोस्त नहीं है , इनसे जान-पहचान  इंटरनेट की दुनिया के दो सशक्त प्लेटफॉर्म फेसबुक और व्हाट्सएप्प  के माध्यम से हुई थी।  इनमे सभी आला  दर्जे के घुमक्कड़ तो थे ही , कुछ लोग ब्लॉग भी लिखते है।  इनमे से अधिकांश लोगों से इंटरनेट माध्यम से ही जुड़ा था।  वास्तव में मुलाकात का संयोग सिर्फ मनु प्रकाश त्यागी जी,  संदीप पंवार जी उर्फ़ जाटदेवता और कमल कुमार सिंह उर्फ़ नारद से ही इसलिए संभव हो पाया , क्यूंकि ये लोग ओरछा आये  थे। दिल्ली के लिए निकलने के पहले ही  मैंने व्हाट्स एप्प ग्रुप पर पहले ही घुमक्कड़ मित्रो को सूचित कर दिया था।
               अब अपने जिला अधिकारी से छुट्टी ली और निकल पड़ा दिल्ली की ओर...... झाँसी स्टेशन  से एक समय भारत की सबसे तेज ट्रैन रही  हबीबगंज ( भोपाल ) -नई दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस से  28  अक्टूबर की  शाम को निकल पड़ा।  चूँकि व्हाट्स एप्प ग्रुप पर भी मित्रों को अप डेट्स मिल रही थी।  दिल्ली पहुँचने के कुछ देर पहले ही प्रसिद्द घुमक्कड़ ब्लॉगर नीरज जाट जी का कॉल आया , दिल्ली में आखिरी  मेट्रो के बारे में बताया।  ( नीरज जी स्वयं दिल्ली मेट्रो में कार्यरत है।  ) लेकिन मेरी सबसे तेज ट्रैन परम्परानुसार विलम्बित होकर मुझे अंतिम मेट्रो से वंचित कर गयी।  नीरज जी ने इतनी रात को ऑटो की बजाय कैब से जाने की सलाह दी।  क्यूंकि दिल्ली के ऑटो रात के सफर के लिए सुरक्षित नहीं है।  और ये भी कहा कि अगर दिक्कत न हो तो उनके घर भी आ सकता हूँ  . खैर दिल्ली में ही रहकर संघ लोकसेवा आयोग (upsc ) की तैयारी कर रहा मेरा बड़ा साला ध्रुव तब तक नई दिल्ली स्टेशन पहुँच चुका था।  ध्रुव से मिलने के बाद मैंने नीरज जी को अपनी कुशल क्षेम बताई।  दिवाली के अवसर पर नई दिल्ली स्टेशन रौशनी से नहाया हुआ था। स्टेशन पर दिवाली और छठ  पर घर जाने वाले पूर्वांचल के  बटोही लोग भरे पड़े थे।  अब मैं और ध्रुव एक ऑटो पकड़ कर (कैब की अनुपलब्धता  कारण ) शादीपुर स्थित ध्रुव के कमरे के लिए निकल पड़े।  ऑटो वाला बिहारी ही निकला तो बोलते बतियाते कब पहुँच गए पता ही नहीं चला।  जब ऑटो के बारे आशंका  हो तो उसके बारे जाँच -परख करना ठीक होता है।  अब वर्दी वाला दिमाग तो चलेगा ही।
                                                         29 की सुबह ध्रुव के साथ मेट्रो से छतरपुर के लिए बहन निक्की से मिलने झोला उठा के चल पड़े।  सफर की थकान या दिल्ली के असर से रात में बुखार आ गया था।  इसलिए बहन के यहाँ खा-पीकर सो गया। तभी कमल जी की कॉल से नींद खुली।  उनसे मिलने की बात हुई।  सुबह से व्हाट्स एप्प पर कोई अपडेट न पाकर बाकि लोग चिंतित थे।  खैर फिर गुरुग्राम वासी अमित तिवारी जी का कॉल आया , वो बताये कि वो , डॉ श्यामसुंदर , नीरज अवस्थी जी के साथ छतरपुर मेट्रो स्टेशन आ रहे है।  कमल भाई को भी मैंने वही आने का बोला।  फिर हम लोगों की मुलाकात छतरपुर मंदिर के बाहर हुई।   उसके बाद आसपास कोई बैठने या बतियाने का उपयुक्त स्थान होने के कारण  हम लोग मेट्रो से ही गुरुग्राम पहुंचे।  वहां मेट्रो स्टेशन के बाहर अमित जी की सिफारिश पर  एक ठेले पर हम लोगों ने स्वादिष्ट लीटी-चोखा का आनंद लिया।   शाम तक हम लोग यूँ ही जल-पान करते हुए घूमते रहे।  बाकि मित्रों ने खमीर उठे हुए जौ  के रस का लुत्फ़ उठाया।  मैं इस विभागीय पेय से दूर रहा।  बातों -बातों में पता ही नहीं चला कि कब अँधेरा हो गया।  अभी तक आभासी दुनिया के मित्रों से प्रत्यक्ष मिलने पर लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिल रहे है।  फिर सब अपनी अपनी राह पकड़ कर आशियाने की ओर चल पड़े। जाते समय डॉ श्याम सुन्दर जी ने पतंजलि के रसगुल्ले और अमित तिवारी जी ने  डेरी मिल्क का सेलिब्रेशन  पैक दिया।  छतरपुर पहुँचने पर बहन जी की प्यार भरी झिड़की की आशंका पर भांजी के प्यार ने पानी फेर दिया। इधर व्हाट्सएप्प ग्रुप पर दिल्ली और आसपास के मित्रों द्वारा मुझसे मिलने का प्रोग्राम बन रहा था।  खैर बहन जी से कुछ देर बतियाने के बाद खा-पीकर सो गया , फिर से बुखार की आगोश में।
                                  अगली सुबह यानि दीपावली का  दिन इसलिए किसी से मिलने की उम्मीद काम ही थी , तो सोचा कि आज का दिन बहन और भांजी के साथ ही आराम से रहेंगे।  परन्तु मोहि कहाँ विश्राम .. दिल्ली में हमारे अज़ीज दोस्त कमल कुमार सिंह  जी तो हमे दिल्ली दर्शन का बीड़ा प्रेम से उठाये हुए थे।  तो सुबह सुबह कॉल किया।  और हम बिना नाश्ता किये चल पड़े , मेट्रो की ओर।  आज क़ुतुब काम्प्लेक्स , रायसीना हिल्स ( इंडिया गेट, संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, सचिवालय ), रेल म्यूजियम , लाल किला आदि देखने का कार्यक्रम था।  अब कमल भाई से हमारी मुलाकात कुतुबमीनार मेट्रो स्टेशन पर हुई।  कमल भाई की मोहब्बत भी गजब की थी , इससे पहले हम सिर्फ एक बार इस १५ अगस्त को ओरछा में  मनु प्रकाश त्यागी जी के साथ मिले। तब मैं कमल भाई को लगभग न के बराबर ही जानता था।  हाँ , ब्लॉगिंग के सुनहरे दिनों में नारद आम से लिखे इनके ब्लॉग पोस्ट्स को जरूर पढ़ा था , पर ये नहीं जनता था, कि कमल भाई ही नारद थे।  खैर जब नारद से मिल ही लिए तो नारायण-नारायण होना तय था।  अब क़ुतुब काम्प्लेक्स में सुबह का नाश्ता किया।  फिर निकल पड़े क़ुतुब मीनार के दर्शन करने के लिए ... क़ुतुब मीनार के बारे में अभी तक किताबों में ही पढ़ा था।  आज देखने का मौका मिला।  चूँकि आयोग की परीक्षाओं में इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते क़ुतुब मीनार के बारे में बहुत कुछ पढ़ा था , जैसे क़ुतुब मीनार कुतुबुद्दीन ऐबक ने नहीं बनवाई थी , बल्कि उसने तो उस पर मुस्लिम बाना चढ़ाकर उसे क़ुतुब मीनार ( सूफी संत कुतुबुद्दीन काकी के सम्मान में ) नाम दिया।  तो  इस मीनार को देखने की रूचि इसलिए भी ज्यादा थी।  जब क़ुतुब मीनार प्रांगण में प्रवेश किया तो चारो तऱफ हिन्दू स्थापत्य के ध्वंष बिखरे  पड़े थे , और इन सबके बीच ठीक क़ुतुब मीनार के बगल में लौह स्तम्भ सीना ताने खड़ा था।  चौथी सदी में बने इस अद्भुत धातु शिल्प पर  आज का  विज्ञान  भी अचंभित है।  किसी चंद्र नामक शासक ( जिसकी साम्यता गुप्त शासक चन्द्रगुप्त द्वितीय से की जाती है।  ) ने इस स्तम्भ को बनवाया था। सदियों से  खुले में खड़े इस लौह स्तम्भ पर जंग न लगना सचमुच प्राचीन भारतीय धातु विज्ञान का चमत्कार था।  इस पर किसी प्रकार  इस्लामिक मुलम्मा ही चढ़ पाया , इसलिए यह सुरक्षित हिन्दू  बना रहा।  क़ुतुब मीनार के चारो तरफ जिस प्रकार से  हिन्दू स्थापत्य बिखरा पड़ा है , इससे यह स्वमेव ही प्रमाणित होता है , कि यह क़ुतुब मीनार बनने से पहले विष्णु स्तम्भ (जैसा कि माना जाता है , कि पृथ्वीराज चौहान ने इसे बनवाया था ) या विजय स्तम्भ रहा होगा।  इतिहास में जो कहा जाता है , कि क़ुतुब मीनार का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने प्रारम्भ करवाया था, और इसे इल्लुत्मिश ने पूर्ण करवाया।  अब  मैंने जितना इतिहास पढ़ा है ( मैं इतिहासकार होने का दावा नहीं कर रहा हूँ ) तो न तो कुतुबुद्दीन ऐबक और न ही इल्तुतमिश को इतनी फुर्सत और शांति - सुकून मिला कि वो किसी ईमारत का निर्माण करवा सके।  ये गुलाम शासक आक्रमणकारी के रूप में भारत आये , और इनका समय लूट-पाट के बाद बचे समय में खुद को सुरक्षित करने में लगा।  ऐबक ने तो अजमेर (जिसका पुराना नाम अजयमेरु था ) में चौहान शासक (पृथ्वीराज के  पूर्वज ) विग्रहराज चतुर्थ के सरस्वती मंदिर को तोड़ कर अढ़ाई दिन मस्जिद बना दिया  और नाम दिया - अढ़ाई दिन का झोंपड़ा।  इसी तरह इसी क़ुतुब काम्प्लेक्स में कुब्बत-उल-इस्लाम मसजिद , अलाइ दरवाजा जैसे इस्लामिक नमूने भी प्राचीन भारतीय स्थापत्य नींव पर खड़े गए  . हालाँकि सच्चाई जो भी हो , सात बार बसी दिल्ली की ये मीनार आज भी महत्वपूर्ण पहचान है।  पास ही में हवाई अड्डा होने से इसके ऊपर से हवाई जहाज निकलते रहते है।
                                            क़ुतुब मीनार से फुर्सत होने के बाद कमल भाई ने आर्कियोलॉजिकल पार्क घूमने का प्रस्ताव रखा , जिसे ध्वनिमत से पारित किया गया।  पर हाय री ! किस्मत।, भरी दुपहरी में पसीना -पसीना होने के बाद भी हम इस पुरातात्विक उद्यान की दीवाल के चक्कर दिवाली के दिन काटते रहे , पर हमे प्रवेश द्वार न मिला।  अगर मिल जाता तो कुछ गड़े मुर्दे हम भी उखाड़ लेते।  जब थक गए तो फिर पहुंचे मेट्रो स्टेशन सीधे संसद में शिकायत करने के लिए।  पर दिवाली की छुट्टी थी , तो संसद बंद मिली।  तो मन मार कर संसद , नार्थ ब्लॉक , साउथ ब्लॉक के सामने फोटो खिचवाये।  सामने राष्ट्रपति भवन था, सोचा कोई बात नहीं , महामहिम प्रणब दा  से ही मिल आये , परन्तु वहां खड़े सुरक्षा कर्मियों ने तो मुख्य द्वार के पास ही नहीं जाने दिया।  हमने अपना आई डी कार्ड भी दिखाया पर ो भी कुछ काम न आया।  कुल मिला कर इतने द्वारों से हमें निराश ही लौटना पड़ा।  रास्ते में रेल म्यूजियम भी दिवाली की छुट्टी के कारण  बंद मिला।  अब सोचा एक गेट में और कोशिश कर ली जाये , तो पहुँच गए इंडिया गेट , ये गेट तो खुला मिला मगर इसमें घुसना मना था।  तो दूर से फोटो खिंचवाए। प्रथम  विश्वयुद्ध में मारे गए भारतीय सैनिको की स्मृति में इसका निर्माण किया गया था। इस गेट की दीवारों पर शहीद सैनिको के नाम लिखे हुए है।  बाद में श्रीमती इंदिरा गाँधी जी स्वतंत्रता पश्चात् के शहीदों की स्मृति में अमर जवान ज्योति का निर्माण किया। अमर शहीदों को मन ही मन नमन किया।  फिर याद आया कि मेरे बड़े साले ध्रुव का आज जन्मदिन है , इसलिये उसे कॉल करके कनॉट प्लेस बुलाया।  तब तक कमल भाई पैदल ही कनॉट प्लेस की ओर मुझे भी ले चले।  रास्ते में महाराष्ट्र सदन में बैठे हुए डॉ आंबेडकर जी की मूर्ति दिखाई दी , सामान्यतः हर जगह खड़े हुए , ऊँगली दिखते आंबेडकर जी ही दीखते है।  हमने फोटो लेने की कोशिश की , लेकिन बहुत अच्छी फोटो न ले सका।  रस्ते में  ही उग्रसेन की बावली भी देख आये  . हालाँकि कोई बहुत विशेष  बावली नहीं है, प्रेमी युगलों का मिलान स्थल ज्यादा है, लेकिन अभी हिंदी फिल्म पीके में दिखाई देने के कारण  चर्चित ज्यादा हुई।  कुछ देर बाद पदयात्रा करते कनॉट प्लेस पहुंचे। हमसे पहले ध्रुव पहुँच चूका था , लेकिन कुछ देर बाद हम पदयात्री भी पहुँच ये , वही कमल भाई ने क जगह प्रसिद्द वेज विरयानी खिलवाई।  अब ओला कैब बुक करके निकल पड़े दिल्ली की शान लाल किला को देखने के लिए ... 

लेकिन आज किस्मत पूरी तरह से रूठी हुई थी , दिवाली के दिन हमारे साथ ही ऐसा होना था।  जानने के लिए जल ही पढ़िए अगला भाग , तब तक फोटो तो देख ही लीजिये ---- 

जगमगाता नई दिल्ली रेलवे स्टेशन 

लिट्टी-चोखे का आनंद 

जहाँ चार यार मिले। 
दिल्ली की पहचान : क़ुतुब मीनार 
धातुकला का अद्भुत नमूना : लौह स्तम्भ 
अलाइ दरवाजा 

क़ुतुब मीनार परिसर में ही हिन्दू स्थापत्य कला के प्रमाण 

इसके बारे में आपका क्या विचार है ?  

ये स्पष्टतः हिन्दू स्थापत्य है।  


हवाई जहाज और क़ुतुब मीनार 
इंडिया गेट के साथ सेल्फी 
देश की सबसे बड़ी पंचायत : संसद 
कमल भाई के साथ 
नार्थ ब्लॉक : केंद्र सरकार का मंत्रालय 
इंडिया गेट की दीवाल पर लिखे शहीदों के नाम 
 महाराष्ट्र सदन के बाहर  बैठे हुए आंबेडकर जी की मूर्ति 
उग्रसेन की बावली 

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

ओरछा महामिलन की अंतिम बेला के अविस्मरणीय क्षण


अगर आप ओरछा के बारे में जानना चाहते है , तो इन लिंक्स पर क्लिक करके पढ़िए 

इस पोस्ट को शुरू से पढ़ने के लिए नीचे दी गयी लिंक पर क्लिक कर करके पढ़िए 


                                                                 अभी तक आप लोगों ने ओरछा महामिलन की दो दिवसीय कार्यक्रम में तुंगारण्य में वृक्षारोपण कार्यक्रम तक पढ़ा।  अब सभी ओरछा अभ्यारण्य में स्थित पचमढ़िया पहुँच चुके थे।  पचमढ़िया ओरछा अभ्यारण्य के अंदर स्थित पुराने राजशाही  ज़माने की पांच छोटे-छोटे मंदिर है , जिन्हें स्थानीय भाषा में मढिया कहा जाता है।  पांच मढिया होने के कारण इस स्थान का नाम पचमढ़िया पढ़ा।  ये मढिया जामनी  नदी की एक धार में बने टापूओं  पर बनी है।  वैसे पूरा ओरछा अभ्यारण्य भी बेतवा और जामनी नदी के  संगम  पूर्व बने टापू में ही बना है।  इस अभ्यारण्य में पुराने ज़माने के शिकारगाह भी बने है।  जहाँ कभी राजा अपने सिपाहियों के साथ डेरा डालते थे , और जब जंगली जानवर पानी पीने आते होंगे तो उनका शिकार किया जाता था।  इसके अलावा अभ्यारण्य में जंगली जानवर देखने के लिए जन्तुर टावर भी बना है , जिस पर से जामनी नदी की खूबसूरती बड़ी प्यारी दिखती है।  ओरछा अभ्यारण्य में वैसे बड़े और हिंसक जानवर तो नही है , लेकिन हिरन, सांभर , नीलगाय , सियार , भेड़िया , बन्दर , लंगूर  जैसे जानवर आसानी से देखे जा सकते है  हालाँकि यह अभ्यारण्य अपने पक्षी परिवार के लिए प्रसिद्द है।  यहाँ भारतीय उपमहाद्विप में मिलने वाले लगभग सभी पक्षी पाए जाते है।  और चार प्रजाति के विलुप्ति के कगार पर पहुँच चुके गिद्ध प्रचुर संख्या में है।  वैसे गिद्ध अभ्यारण्य से ज्यादा आसानी से छतरियों , जहांगीर महल और चतुर्भुज मंदिर के शिखरों पर देखे जा सकते है। गिद्धों के लिए वन विभाग द्वारा वल्चर रेस्टोरेंट बनाने की योजना है , जिसमे किसी एक निश्चित जगह पर आसपास के गांवों में मरे हुए पशुओं के शव को लेकर रखा जायेगा। 
                                                                         तो अब वापिस लौटते है , अपने महामिलन की ओर.... महिलाएं और बुजुर्ग ( हालाँकि ये खुद को जवानों की श्रेणी में ही मानते है ) गाड़ियों से , कुछ लोग पैदल ही पचमडिया की ओर निकल पड़े।  चूँकि हमारे कैटरर्स नत्थू  कुशवाहा  पहले से ही पचमढ़िया पहुंचकर अपने काम में लग चुके थे  . मेरे पहूँचने तक महिलाएं  और बच्चे  नदी के धार में छलांग लगाने से नही रोक पाए।  लेकिन अभी तक पुरुष खुद को संभाले हुए थे।  मैं हमारे ग्रुप के सम्मानित  और बड़े फोटाग्राफर -ब्लॉगर सुशांत सिंघल जी को पचमढ़िया से थोड़ी दूर शिकारगाह की तरफ ले गया , ताकि वो आराम से बिना किसी व्यवधान के शिकार कर सके।  हालांकि सुशांत जी के एक कान से कम श्रवण शक्ति के कारण मुझे थोड़ी सी झल्लाहट हुई , कि  मैं जबसे अपनी बकबक करते जा रहा हूँ , और ये उसे बार बार अनसुना कर रहे है।  खैर बाद में जब उन्होंने अपनी इस समस्या को बताया तो मुझे खुद की सोच पर शर्मिंदगी हुई।  खैर यहां शिकारगाह और आसपास सुशांत जी ने अपने बड़े से कैमरे से खूब शिकार किये।  मुझे वही एक नन्हा सा मोरपंख मिल गया , जिसे मैंने अपनी शर्ट में लगा लिया।  सुशांत जी तल्लीनता से अपने शिकार कर रहे थे।  तभी दूसरी ओर से आवाज़ें सुनने को मिली , तो देखा दूसरी तरफ बीनू कुकरेती जी , कमल भाई , डॉ त्यागी और पंकज शर्मा जी अपने-अपने  हथियार (कैमरे ) लेकर शिकार खोज रहे है। तो मैंने उन्हें नदी की धारा पार कर दूसरी तरफ आने को कहा।  बीनू भाई तो जैसे -तैसे पार कर के आ गए। बाकि लोगों को दिक्कत हो रही थी, तो कमल भाई और डॉ त्यागी  नल-नील की भूमिका में आ गए।  और पत्थरों से एक छोटा सा सेतु ( इसे रामसेतु तो नही प्रेमसेतु कह सकते है ) बना डाला।  शीघ्र ही पंकज शर्मा जी , रमेश शर्मा जी भी नदिया के पर आ गये।  नदिया के उस पार एक और बेहतरीन शिकारी प्रकाश यादव जी भालसे दंपत्ति को अपने कैमरे में कैद कर रहे थे। संजय कौशिक जी के सुपुत्र युवराज भी एक बढ़िया फोटोग्राफर की तरह अन्य लोगों की यादों को अपने कैमरे में संजो रहा था।  मैं नदिया के इस पार आ गया ,इस पार आकर सबसे पहले भोजन का जायजा लिया, जो लगभग चरम सीमा पर था।  भोजन को स्थानीयता का  पुट देने के लिए दाल-बाटी-भर्ता , चूरमा के लड्डू विशेष तौर पर बनवाये गए थे।  नदिया के दोनों तरफ लोग नहाने का मजा ले रहे थे।  शिकारगाह से थोड़ी दूर पर प्राकृतिक तरणताल में पुरुष सदस्य पूरी मस्ती से नहा रहे थे।  जिसमे सबसे उम्रदराज सदस्य  रमेश शर्मा जी सबसे अधिक सक्रियता से नहाने का मजा ले रहे थे।  कमल भाई तो नदी के पानी में एक लाश की तरह शवासन कर रहे थे , तो रूपेश शर्मा  जी, सचिन जांगड़ा जी, नरेश सहगल जी , कौशिक जी , विनोद गुप्ता जी , नटवर भार्गव जी , रजत शर्मा जी, आरडी प्रजापति जी , संजय सिंह जी  भी किसी तरह मस्तीखोरी में पीछे नही रहे। 
                                                                                  हरेंद्र धर्रा  जी इन सब से दूर शिकारगाह के पास जमीन पर ही पेड़ की  ठंडी छाँव में नींद का मजा ले रहे थे, वो तो एक गौमाता ने उनकी नींद को भंग  कर दिया।  इधर मैंने पंकज राय के साथ बाइक से सुशांत सिंघल जी और पंकज शर्मा जी को फोटोग्राफी करने जन्तुर टावर की ओर  भेज दिया।  मैं खुद परसो से लगातार चली आ रही भागदौड़ से थक गया था , तो अपनी कार में ही झपकी लेने की सोच रहा था , कि हमारे एक सहकर्मी आबकारी उपनिरीक्षक सियाराम चौधरी जी का कॉल आ गया , कि वो टीकमगढ़ से ओरछा पहुँचने वाले है।  सियाराम जी का परिचय कमल भाई से मैंने उनकी शिमला -मनाली यात्रा के लिए कराया था।  इसलिए वो कमल भाई से मिलने आ गए।  तो उन्हें स्नानरत कमल भाई  लोगों से मिलवाया , चूँकि वो अपनी फॅमिली के साथ आये थे , इसलिए ज्यादा देर नही रुके और चले गए। इतने में टीकमगढ़ जिले के पुलिस अधीक्षक श्री निमिष अग्रवाल जी अपने किसी परिचित को पचमढ़िया घूमने ले आये , खैर उनसे जय हिन्द कर हम किनारे हो लिए।  अब स्नान -ध्यान सबका हो चुका था , थोड़ी थोड़ी भूख सबको लगने लगी थी , इधर महिला मंडली ने चूरमा के लड्डुओं पर हाथ साफ करने में देर नही की।  खैर उनकी ये चोरी सुशांत जी के कैमरे ने पकड़ ली।  सबसे पहले बच्चो को भोजन से निवृत कराया गया।  कुछ लोगों ने इससे पहले बाटी नही खायी थी , इसलिए उन्हें इसे देखकर शंका थी , तो उनकी फरमाइश पर कुछ रोटियां भी सिंकवा ली गयी थी।
                                                                            पचमढ़िया में शुद्ध प्राकृतिक वातावरण में पत्तों से बनी पत्तलों और दोनों में भोजन प्रारम्भ हुआ।  तभी ग्रुप के संस्थापक एडमिन किशन जी ( कोल्कता से ) के आने की सूचना मोबाइल पर मिली। सभी के चेहरे पर एक मुस्कुराहट दौड़ गयी।  क्योंकि पहली बार ग्रुप के चारों  एडमिन एक साथ एक  जगह पर मिलने वाले थे।  उनका भोजन में साथ देने के लिए मैं , कौशिक जी और अन्य  एक दो लोग भोजन करने के लिए रुक गए. मजे की बात ये रही कि भोजन करने बैठे जो लोग पहली बार बाटी से रु-ब-रु हो रहे थे , उन्हें ये छोटा  सा  गोल-गोल सा व्यंजन किस तरह से खाया जाये समझ ही नही  आ रहा था।  खैर एक दूसरे की देखा देखी  और पूछ कर सबने प्रेम से इस वनभोज का लुत्फ़ उठाया।  इधर मुझे सबको इतने प्रेम से खाता  देख किसी बेटी का व्याह करने वाले पिता जैसा भाव महसूस हो रहा था  जिन लोगों ने अपने लिए अलग से रोटियों  की फरमाइश की थी , वो भी बाटियों  के स्वाद के आगे आधी से ज्यादा रोटी न खा पाए।  हमारे सूरज मिश्र जी को तो परोसने वाले बिना पूछे ही परोस रहे थे।  खाने के साथ ही हंसी -मजाक का दौर जारी रहा।लंबे समय के बाद जीवन में हंसी-ठहाको का लंबा दौर चला था। प्रकाश जी की पत्नी नयना भाभी अपने हाथ से बनाकर कुछ मिठाई रायगढ़ से लेकर आयी थी , तो रूपेश जी ग्रेटर नॉएडा से बालूशाही लेकर आये थे , जिसे उन्होंने सबको प्रेम से भोजन के साथ ही खिलाया।   
                                                                                     अब खाने के बाद हम बड़ों की मस्ती के बीच बच्चों की प्रतिभा छूट रही थी , तो सर्वसम्मति से बच्चों के हुनर को सामने लाने के लिए अगला सेशन बच्चो का ही रखा गया।  इसमें बच्चों ने गीत, कविता , नृत्य के माध्यम से अपने अपने हुनर को सबके सामने रखा।  इन सबमे हेमा जी की प्यारी सी बिटिया साक्षी ने अपनी कवितायेँ सुनाकर सबका दिल जीत लिया , तो होनहार युवराज कौशिक ने हास्य कविता सुनाकर सबको लोट-पोट कर दिया। बच्चों को इनाम मिलता देख हमारे विनोद गुप्ता जी भी कविता सुनाने को तत्पर हो गए , लेकिन जब पता चला कि इनाम सिर्फ बच्चो के लिए है , तो अपना कदम पीछे खींच लिया।  बच्चो के बाद बड़ों की भी परीक्षा होनी थी, जिसका किसी को भी नही पता था , मास्टरनी बनी  नयना यादव भाभी जी ने झट से मदारी की तरह अपने झोले में से प्रश्न पत्र निकले।  इस प्रश्न पत्र के सभी सवालों के जवाब ध  अक्षर  से  देने थे।  अब लगभग 20  प्रश्नों के उत्तर एक मिनट में देने थे।  मैंने लगभग सभी प्रश्नों का जवाब सही दिया।  सबसे आखिरी में प्रश्न था , इस प्रश्न पत्र देने के बाद आप देंगे-----सभी ने इसका जवाब धन्यवाद लिखा , लेकिन मैंने ध से धमकी लिखा।  (अब वर्दी वाला धन्यवाद तो देने से रहा )  खैर अब सब परीक्षा देने के बाद परिणाम का इंतजार करने लगे।  
                                                               तभी किशन बाहेती जी का तूफानी आगमन हुआ. और मैं , कौशिक जी , रितेश जी , भालसे जी उनका स्वागत करने दौड़ पड़े।  किशन जी आना भी इस महामिलन की एक बहुत बड़ी सफलता रही।  क्योंकि जब किशन जी को किसी ट्रेन में रिजर्वेशन नही मिल रहा था , तो उन्होंने राजधानी में सीट बुक की , जो झाँसी नही रूकती थी, इसलिए उन्होंने कानपूर तक का रिजर्वेशन करवाया।  वापिसी भी कानपूर से 25 की रात को राजधानी से ही थी।  मतलब सिर्फ सबसे मिलने अपनी नई दुकान की दुकानदारी छोड़कर कुछ घंटों के लिए ही किशन जी का आना , इस ग्रुप के आपसी प्रेम का परिणाम था।  अब जिन सज्जनों के भोजन नही किया था, वो किशन जी के साथ पत्थरों पर बैठकर खाने बैठे , सूरज मिश्र जी दुबारा साथ देने बैठ गए  पंकज शर्मा जी और किशन बाहेती जी इन दोनों महानुभावों ने अपनी हर यात्रा में अलग ही लुक अपनाया।  इसलिए इन्हें आसानी से पहचान नही सकते थे.  खैर मस्ती भरे माहौल  में हमारी मास्टरनी जी यानि नयना भाभी जी अपने काम में लगी थी , और परीक्षा परिणाम तैयार हो गया। अब परीक्षार्थियों की दो श्रेणी बनाई गयी , होशियार और सामान्य।  मुझे गलती से होशियार वाली श्रेणी में पटक दिया गया।  अब सामान्य श्रेणी के परिणाम घोषित पहले किये गए।  इस में कई महानुभाव बड़े मजेदार निकले।  हमारे विनोद बाबू सबसे टॉप पर रहे (पीछे से ) इन्होंने सिर्फ उसी सवाल का जवाब सही दिया , जो उदहारण के तौर पर बताया गया था।  सिविल सेवा की तैयारी कर रहे सूरज मिश्रा जी ने महाभारत के पात्र का नाम धंधारी लिखा ( वो भी किसी की नक़ल कर के ) , इस श्रेणी में टॉप करने लायक हमारी मास्टरनी जी को कोई न मिला। अब दूसरी श्रेणी यानि होशियारों की श्रेणी का परिणाम आया तो जिंदादिल बाइकर सचिन जांगड़ा जी सबसे आगे निकल गए।  उनके पीछे उपविजेता के रूप मुझे चुना गया।  एक प्रश्न पत्नी को क्या कहते है ? के जवाब में मेरा जवाब घरनी गलत माना  गया।  मास्टरनी जी का कहना था , कि घरनी कोई शब्द ही नही है , तो मैंने उसकी उत्पत्ति और तत्सम-तद्भव सब बताया।  तब उसे सही शब्द माना गया।  लेकिन जवाब तो ध से लिखना था , न कि घ से।  और मेरे आखिरी जवाब धमकी को भी गलत मान लिया गया।  जांगड़ा जी विजेता बनकर खुश , तभी कमल कुमार सिंह जी ने रहस्योद्घाटन किया , कि  जांगड़ा जी को जवाब उन्होंने बताये है।  और मेरा सिल्वर मैडल  अब गोल्ड में बदल गया।  खैर अब सूरज ढलने के लिए मचल उठा था , और हमने भी अपना बोरिया बिस्तर बांध लिया।
                                                                 तभी विनोद गुप्ता जी थाईलैंड -थाईलैंड चिल्लाते हुए कौशिक जी के चक्कर काटने लगे।  ( दरअसल ग्रुप में एक बार कौशिक जी ने बताया था, कि वो घरवालों को गुजरात घूमने का बताकर थाईलैंड घूम चुके है , और विनोद भाई इसी रहस्य को श्रीमती कौशिक जी को बताना चाहते थे ) अंततः विनोद जी ने श्रीमती नीलम कौशिक को जब थाईलैंड वाली बात सुनाई तो पूरा ग्रुप अपनी सांसे थामे आगे होने वाले तूफान के इंतजार में इन दोनों के चेहरे को देख रहा था।  नीलम भाभी ने बड़ी ख़ुशी से बताया कि कौशिक जी के साथ वो भी थाईलैंड गयी थी।  अब विनोद भाई का चेहरा देखने लायक था और पूरे ग्रुप ने ठहाको से जंगल गुंजा  दिया।  कौशिक जी बोले - मैंने घरवालों को गुजरात जाने का कहा था, घरवाली को नही।  विनोद भाई बड़ी ही मासूमियत से बोले - ये वाले एडमिन पूरी बात नही बताते।  तो हाजिर जवाब कौशिक जी ने कहा - ऐसे ही थोड़े किसी को एडमिन बना देते है।
                                                          अब सब लोग वापिसी को तैयार ... महिलाएं और बच्चे पहले गाड़ियों से निकल गए , इन्हें छतरियों के पास मिलने को कह दिया था।  बाकि लोग पैदल ही चल पड़े , गाड़ियां जब वापिस लौटी तो उनमे बचे लोग भी सवार हो गए।  यहां एक गफलत ये हुई कि जो लोग पैदल आगे निकल गए थे, तो उन्हें छतरियों के पास मिलने की बात नही पता थी , इसलिए वो सीधे होटल ही पहुँच गए।  अब सूरज डूब  चूका था , सबसे बाद में मैं , कौशिक जी, किशन जी , प्रकाश जी , रितेश जी और रूपेश जी आदि पहुचे।  तो मैंने समय को देखते हुए चाय पीने का सुझाव रखा।  अतः छतरियों के पास ही स्थित  लग्जरी होटल ओरछा रिसोर्ट के कॉन्फ्रेंस हाल के पास पहुचे।  बाकी जो लोग छतरियों और होटल में थे , उन्हें भी खबर कर दी गयी।  जो लोग छतरियों के पास थे , उन्हें पहुचने में ज्यादा समय नही लगा।  चाय और कुकीज़ के आने तक सबने कॉन्फ्रेंस हॉल में फोटो सेशन कराया।  होटल वालो में कुछ लोग थकावट के कारण  नही आ पाए।  जो आये तब तक चाय -कुकीज़ निपट चुके थे।  अब विदाई का दौर चालू होने वाला था।   किशन जी को फिर से कानपूर से राजधानी एक्सप्रेस पकड़नी थी।  अब समस्या ये थी, कि कानपूर तक अगर बस से जाया जाये , तो ट्रैन छूट सकती है , और टैक्सी वाले 6000 रूपये मांग रहे थे, जो बहुत ज्यादा थे।  जब कोई व्यवस्था न बन पायी तो फिर मैंने अपने ड्राइवर कैलाश को बोला मेरी फोर्ड फिगो कार से किशन को सकुशल कानपूर छोड़कर आये।  इधर रितेश जी , कौशिक जी और दिल्ली पार्टी भी झाँसी निकलने की तैयारी  करने  लगे।  अभी प्रकाश  यादव और उनका परिवार , कमल भाई , बीनू कुकरेती जी और डॉ प्रदीप त्यागी को छोड़कर बाकी सभी लोग ओरछा महामिलन की यादें अपने साथ लेकर निकल पड़े , फिर मिलने का वादा करके ....... 
छूटी बात :-
पिछले भाग में बताना भूल गया कि मथुरा से नीरज चौधरी अपनी मोटर साइकिल से आये , उनके साथ एक और बड़े घुमक्कड़ धौलपुर से सत्यपाल चाहर भी आये , परंतु जल्द ही लौट गए , इसलिए उनका जिक्र नही हो पाया।  ग्रुप के एडमिन संजय कौशिक जी पुरे ग्रुप की तरफ से मेरे पुत्र अनिमेष के लिए बड़ी प्यारी सी शेरवानी लेकर आये थे।  जिसे बुआ जी ने घर आकर मेरी श्रीमती जी को दी । इसके अलावा जो लोग सपरिवार आये थे, वो अनिमेष के लिए नेग के तौर पर 100 -100 रूपये देकर गए।  यहां बात पैसों की नही , बल्कि वो सम्मान और प्यार की है, जो आजकल अपने सगों में भी कम  होता जा रहा है।  और यहां एक आभासी कहे जाने वाले माध्यम से जुड़े लोग अब एक परिवार के सदस्य की तरह हो गये।  ये महामिलन भले किसी इतिहास की किताब में दर्ज न हो, पर  हमारे दिलों में हमेशा के लिए अंकित हो गया।
इस महामिलन की सफलता आये हुए सभी लोगों का महत्वपूर्ण योगदान तो है  ही , पर कई लोग जो ओरछा नही भी आये उनका भी परदे के पीछे सहयोग रहा ललित शर्मा जी, नीरज जाट जी , संदीप पंवार जाटदेवता जी , मनुप्रकाश त्यागी जी , अरविन्द मिश्र जी , अवतार सिंह पाहवा जी , देवेंद्र कोठारी जी , अमित गौड़ा जी , अनिल दीक्षित जी , योगेश्वर सारस्वत जी , महेश सेमवाल जी , सुशील कैलाशी जी , प्रेम सागर तिवारी जी , अमित तिवारी जी ,ओरछा से  हेमंत गोस्वामी जी , अमित चतुर्वेदी जी , पुष्पेंद्र गौर जी और भी कई नाम जिनका महत्वपूर्ण सहयोग रहा , परंतु किसी कारणवश मैं उनका नाम भूल रहा हूँ , तो उन सभी ज्ञाताज्ञात , चराचर , जड़-चेतन सभी कोटिशः आभार।  सबसे पहले श्री 1008 अनंत विभूषित सकल ब्रम्हांड राजाधिराज ओरछा के अधिपति श्री रामराज सरकार को आत्मिक आभार जिन्होंने आद्योयान्त आशीर्वाद बनाये रखा।  

पचमढ़िया में अर्धवृत्त में सदस्य गण बांये से - कमल जी, आरडी जी, भालसे जी, कौशिक जी, जांगड़ा जी, हरेंद्र जी, रमेश जी , रजत शर्मा , विनोद गुप्ता जी , सूरज मिश्र 
द्वितीय अर्धवृत्त में सदस्य बांये से - पंकज शर्मा जी, संजय सिंह जी, कमल कुमार, आरडी प्रजापति जी , भालसे जी , कौशिक जी , जांगड़ा जी , हरेंद्र जी और रमेश शर्मा जी 
सेल्फी टाइम- पंकज शर्मा, सुमित शर्मा , सत्यपाल चाहर , संजय सिंह , नरेश सहगल, नरेश चौधरी, सहीं जांगड़ा  रितेश गुप्ता , विनोद गुप्ता 
दो प्यार करने वाले जंगल में खो गए (भालसे दम्पति )
कल कल बहता नीर 
बैठे हुए (बांये से )- रजत शर्मा, विनोद गुप्ता , रूपेश शर्मा और मुकेश पांडेय , पहली पंक्ति में खड़े (बांये से ) - सचिन जांगड़ा, डॉ सुमित शर्मा , सूरज मिश्र , किशन बाहेती , संजय कौशिक , हरेंद्र धर्रा , नरेश सहगल, प्रकाश यादव और नटवर भार्गव , पीछे खड़े (बांये से ) - बीनू कुकरेती , कमल कुमार , रितेश गुप्ता , रमेश शर्मा , पंकज शर्मा और सुशांत सिंघल 
शिकारगाह को जाती राह : राह के उस पार कुछ शिकारी 
जन्तुर टावर के पास शिकार की खोज में सबसे बड़ा शिकारी 
पानी में बच्चो और महिलाओं की मस्ती 
प्रेमसेतु का निर्माण करते हुए नारद जी 
छोटे शिकारी युवराज कौशिक ने भी सबके कान काटे हुए थे 
रोटी भी बिलकुल देशी अंदाज में 
नयना यादव भाभी बाटी सेंकते हुए 
ये रहा हमारा भोजन - दाल-बाटी-भर्ता , चूरमा के लड्डू ,सलाद और अन्य मिठाई 
और इस तरह यादें संजोई गयी 
बांये से - नीलम कौशिक, हेमा सिंह, नयना यादव , रश्मि गुप्ता और आधी कविता भालसे 
अर्धवृत्त में 
पेट पूजा शुरू हो गयी ...... 
वन्य प्राणियों की रक्षा करे 
बीच जंगल में पत्थरो पर बैठकर खाने का मजा ही कुछ और है 
ये भी मिली 
किशन के आने के बाद भोजन की दूसरी सभा 
बीएसएनएल के इंजिनियर सहगल साहब शायद सिग्नल ढूंढ रहे है। 
फिर शाम ढलने  लगी 
होटल ओरछा रिसोर्ट के लॉन में - घुमक्कड़ी दिल से 
कॉन्फ्रेंस हॉल में बांये से - नटवर भार्गव, नरेश सहगल, किशन बाहेती , मुकेश पांडेय और पंकज शर्मा 
नारी शक्ति : घुमक्कड़ी दिल से 
बांये से - रितेश गुप्ता , मुकेश पांडेय, नरेश सहगल, सुशांत सिंघल और रमेश शर्मा 
विदाई की बेला - बांये से : पंकज शर्मा, नरेश सहगल, रमेश शर्मा, नटवर भार्गव, प्रकाश यादव, रजत शर्मा, संजय कौशिक, मुकेश पांडेय, किशन बाहेती , सुशांत सिंघल, विनोद गुप्ता , रितेश गुप्ता , रूपेश शर्मा ,सुमित शर्मा और कमल सिंह 
अच्छा तो अब चलते है ...... फिर से मिलने के लिए 

मिलेंगे फिर से
 घुमक्कड़ी दिल से  

रविवार, 22 जनवरी 2017

ओरछा महामिलन :साउंड एंड लाइट शो , परिचय ,तुंगारण्य में वृक्षारोपण


अभी तक आपने ओरछा महामिलन का पहले दिन का विवरण पढ़ा।  सभी लोग तय कार्यक्रम के अनुसार निश्चित समय पर रामराजा मंदिर पहुँच चुके थे।  आरती शुरू हो चुकी थी, मगर मैं अभी तक घर पर था। जब अनिमेष गोद  से उतरने  का नाम ही नही ले रहा था , तो उसे साथ ही लेकर कार से मंदिर पहुंचा ...


ओरछा का साउंड और लाइट शो 


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अभी तक आपने ओरछा महामिलन का पहले दिन का विवरण पढ़ा।  सभी लोग तय कार्यक्रम के अनुसार निश्चित समय पर रामराजा मंदिर पहुँच चुके थे।  आरती शुरू हो चुकी थी, मगर मैं अभी तक घर पर था। जब अनिमेष गोद  से उतरने  का नाम ही नही ले रहा था , तो उसे साथ ही लेकर कार से मंदिर पहुंचा , तो देखा ग्रुप के अधिकांश पुरुष सदस्य रामराजा के दर्शन कर चुके है।  हाँ महिलाये जरूर लाइन में लगकर दर्शन की प्रतीक्षा में थी।  पुरुष दूर से ही दर्शन बिना लाइन में लगे कर चुके थे।  ओरछा के रामराजा मंदिर में यह अच्छी व्यवस्था है, कि अगर आप लाइन में नही लगना चाहते है , तो दूर से मंदिर के आंगन से भी बड़े आराम से दर्शन कर सकते है।  दूसरी तरफ वी आइ पी दर्शन की व्यवस्था भी है , इसके लिए मंदिर के पदेन प्रवन्धक यानि टीकमगढ़ कलेक्टर  / निवाड़ी  एस  डी एम /ओरछा के तहसीलदार से अनुमति  लेकर दर्शन किये जा सकते है।  वैसे स्थानीय प्रशासन में जान-पहचान भी काम आ जाती है।  मैं भी सबको वी आई पी दर्शन की फ़िराक में था।  पर रामराजा को शायद ये मंजूर न था।  अब मंदिर के बाहर सब महिलाओं का इंतजार कर रहे थे , तो कुछ सदस्य  मंदिर के बाहर अपने कैमरे का सदुपयोग कर रहे थे।  ( मंदिर के अंदर फोटोग्राफी / वीडियोग्राफी प्रतिबंधित है। )  अनिमेष को देखकर डॉ प्रदीप त्यागी जी पास आये , और उसे गोद में उठाकर खिलाने  लगे।  
                                                    अब साउंड एंड लाइट शो का समय होने वाला था।  अगर आपको ओरछा घूमने का सही आनंद लेना है , तो पहले साउंड एंड लाइट शो को देखिये , जिससे ओरछा और इसके इतिहास , पुरातत्व और महत्व की जानकारी मिल जाएगी।  अब आप बिना गाइड के भी ओरछा में घूम सकते है।  क्योंकि ओरछा की महत्वपूर्ण इमारतों और इतिहास के बारे में मोटी -मोटी बातें  आपको पता ही चल जाएगी।  हाँ अब अगर आपको छोटी-छोटी बातें भी जननी है , तो आप आराम से गाइड कर सकते है।  सर्दियों में एक घंटे का हिंदी का शो 7 :45 शाम से शुरू होता है।  जब देर होती देखी  तो मैंने संजय कौशिक जी को कहा कि जितने लोग दर्शन कर चुके है , वो पहले चले बाकी लोग गाड़ियों से आ जायेंगे।  हम अधिकांश लोग पैदल ही रामराजा मंदिर से सीधे राजा महल के बहरी हिस्से दीवान -ए -आम से सटे मैदान में पहुँच गए।  सब लोग जो आ चुके थे , उन्हें अंदर बिठाया , तभी मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम के होटल शीश महल और होटल बेतवा रिट्रीट के प्रबंधक और मेरे मित्र अमित कुमार मिल गए।  तो बाकी लोगों का इंतजार करते हुए उनसे गप्पे की।  फिर जब सचिन त्यागी जी बाकी बचे हुए सदस्यों को साथ लेकर आये।  सबके बैठने के बाद मैंने टिकट कटवाई।  ( भारतियों के लिए 100 रूपये और विदेशियों के लिए 250 रूपये )  . मध्य प्रदेश में अभी तक ग्वालियर , खजुराहो के अलावा सिर्फ ओरछा में ही साउंड एंड लाइट शो होता है।  जिन लोगों ये तीनो शो देखा है, उनके अनुसार इनमे ओरछा का शो सबसे अच्छा है।  क्योंकि इसमें कई कहानियां  है।  ओरछा के शो में बुन्देलाओं के उद्भव से लेकर उत्कर्ष तक की कहानियाँ  बड़े ही सुन्दर तरीके से बताई गयी है।  इन कहानियों में ओरछा की स्थापना  , रामराजा का अयोध्या से ओरछा  आना , वीरसिंह जूदेव की जहांगीर से दोस्ती, उनके यशस्वी कार्य, रायप्रवीण का सौंदर्य और ओरछा की नियति ,हरदौल के लोकदेवता बनने की कथा, बदरुनिशां (औरंगजेब की बेटी ) का चतुर्भुज मंदिर को बचाना , छत्रसाल और बाजीराव पेशवा की विजय आदि बड़े ही रोचक तरीके से बताया गया है।  ओरछा में ये साउंड एंड लाइट शो मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम के हेरिटेज होटल शीशमहल के माध्यम से संचालित होता है।  ये राजमहल के दीवान-ए -आम के सामने बने खुले मैदान में होता है।  अब मैं अपने आभासी  माध्यम (ब्लॉग/फेसबुक ) से बने मित्रो यथा संदीप पंवार जाटदेवता जी , ललित शर्मा जी, मनु प्रकाश त्यागी जी , कमल कुमार सिंह आदि के साथ ये शानदार शो देख  चुका हूँ।   
                                               मैं चूँकि कई बार ये शो देख चुका था , इसलिए मैं नही गया।  मेरे साथ मेरे अनिमेष बाबु भी थे , इसलिए उन्हें लेकर घर छोड़ा। लौटकर अकेला किला परिसर पहुंचा।  ( ड्राइवर कैलाश को छोड़ दिया )  इतने में पंकज शर्मा जी का कॉल हुआ।  वो झाँसी से ओरछा पहुँच चुके थे।  उन्होंने मंदिर चौराहे पर खुद के खड़ा होने की बात बताई , तो मैंने उन्हें खड़े रहने की हिदायत दी।  जल्दबाजी में जैसे ही गाड़ी रिवर्स की तो पीछे खड़ी कार से मेरी कार टकराई।  तो उसके ड्राइवर से थोड़ी बहस करनी पड़ी , अब चूँकि गलती मेरी थी, तो सॉरी बोलकर निकल पड़ा , क्योंकि टक्कर जोरदार नही थी।  खैर मैं मंदिर चौराहे पहुंचा तो पंकज शर्मा जी सड़क किनारे किसी व्यक्ति के साथ खड़े थे।  मेरे पहुँचने पर उस व्यक्ति से मिलाया , जो मऊरानीपुर का रहने वाला था , और मुझे जानता था। लेकिन मैं उसे नही जानता था।  खैर पंकज जी को लेकर किला परिसर पहुंचा।  शो ख़त्म होने वाला ही था।  तब तक उनका हाल समाचार प्राप्त किया।  पंकज जी का ओरछा आना भी काम रोमांचक नही था।  यही हमारे महामिलन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।  शो समाप्ति पर सभी जब बहार आये तो पंकज जी से सबका मिलना हुआ।  
                                                     फिर सब गाड़ियों से होटल वापिस हुए।  होटल लौटने पर खाना लग चुका था।  परंतु संस्थापक एडमिन मुकेश भालसे जी का आग्रह था , कि खाने से पहले सबका एक बार परस्पर परिचय हो जाये।  अतः उनका आग्रह मानकर परिचय प्रारम्भ हुआ।  पर भूखे पेट भजन न होय गुसाई।  और बच्चों को तो रहा ही नही जा रहा था।  अतः मैंने बाकी लोगों का परिचय भोजन पश्चात् करने का निवेदन किया , जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया।  अब भोजन करने के बाद पुनः परिचय शुरू हुआ।  परिचय शुरू होते ही सब फ्लैशबैक में चले गए।  सचमुच ये बड़ा भावुक क्षण था।  सब ग्रुप से जुड़ने और सदस्यों से अपने मिलने -जुलने की बात सुना रहे थे।  मुकेश भालसे जी ने ग्रुप की स्थापना की कहानी सुनाई , तो बुआ जी ने अपनी परिवार के बिना अनजान शहर में अनजान लोगों से मिलने के लिए बिना टिकट लिए ही ट्रेन से ओरछा आने की भावुक दास्ताँ सुनाई।  सब यादों के झरोखों में खो रहे थे।  ग्रुप के प्रति समर्पित प्रतीक गाँधी जी ने बताया कैसे उनकी यात्रा से उनके गांव इ दोस्त भी न केवल घुमक्कड़ बने , बल्कि घुमक्कड़ी दिल से ग्रुप के सदस्य भी बने।  मूलतः बंगाली संदीप मन्ना जी ( इन्हें बाइक यात्राएं ज्यादा पसंद है।  ) हिंदी में कमजोर होने के बाद भी अपनी कहानी हिंदी में सबसे साझा की।  ग्रुप के अन्य एडमिन संजय कौशिक जी , रितेश गुप्ता जी ने भी अपने अनुभव बांटे।  सूरज मिश्र , प्रकाश यादव जी, रूपेश शर्मा  जी , रामदयाल प्रजापति भाई , कविता भालसे  जी , हेमा सिंह जी , संजय सिंह जी , रमेश शर्मा जी , सचिन जांगड़ा जी , सचिन त्यागी जी , हरेन्द्र धर्रा भाई आदि ने भी अपनी रामकहानी बताई।  इस बीच प्रतीक जी की विशेष फरमाइश पर एक बार चाय का दौर चल चुका है।  रात गहराने लगी थी , सबके चेहरे पर थकान और नींद छा  रही थी। अतः अब सभा विसर्जन का निर्णय लिया गया।  और सुबह आठ बजे तैयार रहने को कहा गया।  ताकि ओरछा अभ्यारण्य में होने वाले दो विशेष और यादगार आयोजन में शामिल हुआ जा सके।
            25 दिसंबर 2017 को सुबह नहा धोकर जल्दी ही मैं तैयार होकर 8 बजे होटल ओरछा रेसीडेंसी पहुँचा तो देखा अभी बहुत से लोग तैयार नही हुए है।  मुम्बई वाली दर्शन कौर यानि  बुआ जी मेरी पत्नी और अनिमेष से मिलना चाहती थी।  तो मैं बुआ जी ,  श्रीमती नीलम कौशिक जी ( सोनीपत , हरियाणा से ) , श्रीमती  कविता भालसे ( इंदौर से ), श्रीमती रश्मि  गुप्ता जी (आगरा से ) और श्रीमती हेमा सिंह जी (रांची , झारखण्ड से ) को अपने परिवार से मिलाने अपनी कार में बिठाकर अपने शासकीय आवास सह कार्यालय लेकर गया।  चूँकि मैंने इसके बारे में अपने घर  पूर्व सूचना  दी थी , इसलिए जब मैं घर पर पहुँचा  तो मेरी धर्मपत्नी निभा पांडेय जी  नहा रही थी , और अनिमेष बाबु सो रहे थे।  तो मैंने ही अपने अतिथियों को पानी का पूछा।  बिना सूचना के अचानक घर  लोगो को लाने  पर पत्नी का सामना करना पड़े , इसलिए बुआ जी को बागडोर सौपकर मैं निकल लिया।  इधर होटल आया तो पता चला कि श्रीमती नयना यादव जी ( रायगढ़ ,छत्तीसगढ़ से ) तो रह ही गयी।  तो अपने ड्राइवर जगदीश को इन्हें घर तक पहुँचाने और सभी को वापिस लेकर आने की जिम्मेदारी देकर मैं आगे के कार्यक्रम की व्यवस्था में लग गया। हमारे अगले कार्यक्रम में बुआ जी , प्रतीक गाँधी जी और उनके दो मित्र अलोक जी और मनोज जी ट्रैन से वापिस लौटने वाले थे।  ग्रुप में सबका प्रेम देखकर विनोद गुप्ता जी खुद को जाने से रोक लिए और फैसला किये कि 25 दिसंबर का पूरा दिन महामिलन के नाम करेंगे।  गाजियाबाद से अपनी कार से सपरिवार आये सचिन त्यागी जी भी इस अविस्मरणीय महमिलन की यादें अपने साथ लेकर  लौट रहे थे।
                                         आज हम लोगो को तुंगारण्य में वृक्षारोपण करना था , ये मेरा ही विचार था , कि इतने राज्यों से एक साथ इतने लोग ओरछा आ रहे है , तो वो ओरछा से सिर्फ लेकर न जाये , बल्कि ओरछा को कुछ देकर भी जाये।  और किसी भी स्थान को पेड़ों से बढ़कर और क्या दिया जा सकता था ? इसके बारे में मैंने ओरछा अभ्यारण्य के प्रभारी अधिकारी रेंजर श्री आशुतोष अग्निहोत्री जी से पूर्व में ही चर्चा कर ली थी।  तुंगारण्य जगह चुनने के पीछे कारण   इतना ही था , कि वहां वन विभाग द्वारा इन वृक्षों की देखभाल होती रहेगी।  श्री अग्निहोत्री जी ने गुलमोहर , कनक-चंपा , कदंब जैसे वृक्ष लगाने को कहा था  अतः मैंने वरुआ सागर की नर्सरी से यही पौधे मंगाए थे।
 होटल में सभी सदस्य तैयार हो चुके थे , मेरे घर गयीं महिलाएं भी वापिस आ चुकी थी।  और नाश्ता तैयार हो चुका था , अतः सभी ने होटल में ही नाश्ता किया।  उसके बाद पूर्व की तरह सभी लोग निकल पड़े तुंगारण्य की ओर।  गाड़ी से जाने वाले लोग पहले पहुंचे , लेकिन बिना टिकट के होने के कारण उन्हें तुंगारण्य में प्रवेश नही मिला।  तो आदतानुसार बाहर सड़क पर ही फोटोग्राफी होने लगी।  अब घुमक्कड़ी दिल से का बैनर भी साथ था।  बाद में जब मैं पहुंचा तो तुंगारण्य में सब लोगों ने प्रवेश किया।  मेरी रेंजर श्री अग्निहोत्री जी से मोबाइल पर बात  हुई  तो वो भी दस मिनट में पहुचने की कह रहे थे।  उनके आने तक खाली समय का सदुपयोग हमारे धुरंधर फोटोग्राफर्स की प्रतिभा का भरपूर दोहन किया गया।  खैर रेंजर साहब के आने के बाद हमारा वृक्षारोपण का कार्यक्रम संपन्न हुआ।  मुम्बई वाले  विनोद गुप्ता  जी ने हमारे ग्रुप के एक सदस्य देवेंद्र कोठारी जी ( जयपुर से )  जो किसी कारणवश ओरछा नही आ पाए , उनसे किये वादे के अनुसार उनके नाम का भी एक पौधा लगाया।  ये ग्रुप के सभी सदस्यों का एक दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान ही तो है , जो न आये हुए सदस्य की भी बात पूरी की गयी, जबकि विनोद भाई कभी कोठारी जी से भी मिले भी नही है।  खैर हमारे महामिलन के स्मारक के रूप में ये वृक्ष तैयार होंगे।  मेरे ख्याल से इस तरह के जिन्दा स्मारक शायद ही किसी घुमक्कड़ समूह ने बनाया होगा।  अब मैं ओरछा रहूँ या न रहूँ , कोई भी सदस्य या उनसे जुड़े व्यक्ति कभी ओरछा आये तो उन्हें बताने के लिए हमारे ये जीवित स्मारक विशेष होंगे  पौधा रोपण के इस पावन कार्यक्रम में सभी यानि बूढ़े, बच्चे और जवान तन-मन और तन्मयता से लगे थे।
 अब वृक्षारोपण के पुनीत कार्य के बाद हम सभी ओरछा अभ्यारण्य में स्थित पचमढ़िया में अपने वनभोज कार्यक्रम के लिए चल पड़े।  हमारे कुक पहले ही पहुँच चुके थे।  गाड़ी में सबसे पहले बच्चों-महिलाओं और बुजुर्गों को तरजीह दी गयी।  मैं  अभ्यारण्य के प्रवेश की टिकट कटाने रुक गया था , तो देखा हमारे ग्रुप के नौजवान सदस्य मिसिर जी यानि सूरज मिश्र जी शौचालय की तरफ भाग रहे है।  बाद में उन्होंने बताया कि उनके खाने पर लोगों ने नजर लगा दी है।  खैर सब लोग इस महामिलन के सबसे यादगार भाग के हिस्सा बनने के लिए पचमढ़िया पहुँच गए थे।  वहां का नजारा देख कर सबका दिल बल्लियां उछालने लगा , बच्चों को तो मन मांगी मुराद पूरी हो गयी थी।  आखिर पचमढ़ियां में ऐसा क्या हुआ हम जानेंगे इस महामिलन की आखिरी मगर सबसे बेहतरीन किश्त में। .....तब तक के लिए राम -राम



साउंड एंड लाइट शो के लिए जाने वाला रास्ता 
साउंड और लाइट शो की एक झलक
दीवान-ए -आम में खास रौशनी

वृक्षारोपण करते हुए 
ग्रुप की महिलाएं भी किसी कार्य में कम नही थी।  

ओरछा अभ्यारण्य के रेंजर श्री आशुतोष अग्निहोत्री के साथ चर्चारत 

मिलेंगे फिर से .. .घुमक्कड़ी दिल से 


अब 25 दिसंबर का दिन हो  और सांता क्लास न आये !
घुमक्कड़ी दिल से 

orchha gatha

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